तुम यहाँ क्यों जमे हुए हो
पत्थर की तरह
तुम पर किसी भी चीज का
असर क्यों नहीं होता
ना तुम बेईमान हो
ना तुम लालची हो
फिर भी तुम खुश हो
मैं कहता हूं
तुम दिकू हो
मैं आदिवासी हूँ
इसलिए मैं अडिग हूँ
तुम अस्थिर हो
तुम कृत्रिमता पर मरते हो
मैं प्रकृति पर निर्भर हूँ
इसलिए मैं रोज
तुम्हारी आंखों में
पत्थर की मानिंद
चुभता रहता हूँ।
सदियां बीत गई हैं
मेरे पुरखे भी
चुभते थे तुम्हारी आंखों में
वह झुकते नहीं थे
तुम्हारे अन्याय के सामने
बल्कि
खड़े रहते थे
सीना तानकर
वह भी अडिग
और तुम हमेशा भयभीत
डरे सहमे...

















