Thursday, December 19, 2019

अडिग

वह कहते हैं
तुम यहाँ क्यों जमे हुए हो
पत्थर की तरह
तुम पर किसी भी चीज का
असर क्यों नहीं होता
ना तुम बेईमान हो
ना तुम लालची हो
फिर भी तुम खुश हो
मैं कहता हूं
तुम दिकू हो
मैं आदिवासी हूँ
इसलिए मैं अडिग हूँ
तुम अस्थिर हो
तुम कृत्रिमता पर मरते हो
मैं प्रकृति पर निर्भर हूँ
इसलिए मैं रोज
तुम्हारी आंखों में
पत्थर की मानिंद
चुभता रहता हूँ।
सदियां बीत गई हैं
मेरे पुरखे भी
चुभते थे तुम्हारी आंखों में
वह झुकते नहीं थे
तुम्हारे अन्याय के सामने
बल्कि
खड़े रहते थे
सीना तानकर
वह भी अडिग
और तुम हमेशा भयभीत
डरे सहमे...

Tuesday, October 1, 2019

बारिश रोक रही है

बेशक वह रास्ता रोक रही है
हिम्मत की परीक्षा ले ही रही है
जहां जाना है वहां जाना ही है
फिर डरना क्या और रूकना क्या
जिस धरती पर हमको पहुंचना है
बरसातों से वहां रोज ही लड़ते हैं
सीधे खडे पहाड़ों पर चढ़ते हैं
गहरी खाई और बहती नदियां
गगनचुंबी पेड़ और फूलों का गांव
देख रहे हैं रस्ता अपना
फिर डरना क्या और रूकना क्या
वहां जाना ही है तो बढ़े चलो
हम भी आते हैं बढ़े चलो

Wednesday, September 18, 2019

सत्ता, दौलत और जंगल

जो संघर्ष करेगा वही बचेगा
संघर्ष, जीने के लिए
संघर्ष, जमीं के लिए
संघर्ष, जंगल के लिए
संघर्ष, प्रकृति के लिए

जो संघर्ष करेगा,
मरकर भी जियेगा
अपने वंशजों के खून में
जीने के जुनून में

जो सत्ता के लिए लडे़ हैं
मिट गए हैं
कोई लड़ाई जीते बिना
भले ही वह कितने ही
सक्षम थे
कितने ही ताकतवर थे
पर मिट गए

जो संघर्ष करेंगे
जीने के लिए
वही बचेंगे
मरकर भी जियेंगे

कुछ लोग हैं जो
उतारू हैं
जंगल को मिटाने के लिए
जंगल के वाशिंदों को
हटाने के लिए
पर वह भूल गए हैं
एक भी बीज बचा तो
उठ खड़ा होगा
फिर से घना जंगल
एक भी इंसान बचा तो
बसा देंगे सैकड़ों बस्तियां

लेकिन सत्ता और दौलत
के लिए लड़ने वालों को
कहाँ समझ आता है
वह पढ़ते हैं
सत्ता के लिए
वह जीते हैं दौलत के लिए
जिस दिन यह मिट जाएंगे
वह किसके लिए लड़ेंगे

पर हम जीते रहेंगे
जंगल के लिए
मरते रहेंगे जमीं के लिए
जब तक एक आखिरी बीज रहेगा
जब तक एक आखिरी जंगल का वाशिंदा
रहेगा
चलती रहेगी
यह लड़ाई
संघर्ष, जीने के लिए
संघर्ष, जमीं के लिए
संघर्ष, जंगल के लिए
संघर्ष, प्रकृति के लिए
जो संघर्ष करेगा
मरकर भी जिंदा वह रहेगा.


जोहार


सरदार 
१८.९.१९

Thursday, September 12, 2019

कचरे का वारिस

कचर का वारिस 
-------
चारों तरफ पर्दे
नीचे कालीन बिछी है
कालीन पर कुछ औरते हैं
कुछ ने साड़ी
कुछ ने सलवार कमीज
हाथों में
सफेद दस्ताने 
पहनी हैं
उनके पास
बांस और बेंत से बनी
चमकदार डलिया में
तरह-तरह का
विभिन्न खुशबूओं वाला
रंग बिरंगा
कचरा भरा है
बहुत साफ-सुथरा
शालीनता से
रखा हुआ कचरा
और उतने सभ्य और शालीन
कचरा बीनने वाले हाथ

तभी
चारों तरफ खामोशी से
बढता हुआ शोरगुल
शोरगुल के साथ में ही
कोतूहल
कैमरों की आंखों से
चमकती बिजली
और कटैक कटैक की
आवाज के साथ
बनती तस्वीरें

वह आगे बढ़ा
शामियाने में
सजा कर
रखे गए कचरे की ओर
और खड़ा हो गया
हाथ बांधकर
कमर के पीछे
ढूंढने के लिए
कचरे से अपना रिश्ता

कैमरों की आंखों में चमक थी
उत्साह था
एक नई तस्वीर थी
साथ में अपने
झुंड के साथ
एक साथ
आगे पीछे
बार-बार
कटैक कटैक करके
बतिया रहे थे
एक नई किस्सागोई
को जन्म दे रहे थे

उसने हिम्मत की
बैठने के लिए
पहले से रखे पीढ़े पर
तशरीफ रखकर
बिना दस्तानों के
नंगे हाथों से
उठा कर
शालीनता से रखे
साफ-सुथरे कचरे से
पॉलीथिन
एक नई
मुहिम चलाई
एकबारी काम आने वाले
प्लास्टिक का उपयोग रोकने की

कचरा
हैरान-सा
परेशान-सा
बाट जोहता
उन नंगे हाथों वाले
के मुंह से
अपनी रिश्तेदारी की
कहानी सुनने को
पर नहीं सुन सका
नहीं जान सका
सुना तो खुद के इस्तेमाल
न की जाने वाली बात
लेकिन कब तक
वह ठगा सा रह गया
अनाथ सा
नहीं मिला
उसे अपना वारिस

कैमरों ने अपना काम जारी रखा
चमकते रहे
बतियाते रहे
फिर चले गए
पीछे-पीछे
और
भीड़ में खो गई
वह सभ्य सी
शालीन सी
कचरा बीनने वाली
बाहर बने कचरा पात्र में
दस्ताने फेंककर
और बन गई भीड़ का हिस्सा

कचरा
इंतज़ार कर रहा था
खुद को वहां से उठाने का

दूसरी जगह पहुंचने का।
------------
सरदार
12.09.2019

Friday, August 30, 2019

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूं!

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूँ
------------------------------

मैं एक ढहता हुआ घर हूं

जब तक मुझमें तुम थे
तब तक मैं जिंदा था
जब तक तुम रहते थे
मैं भी तब रहता था
तुम गए मैं भी जा रहा हूँ

तुम जाते-जाते

किवाड़ों को ओढालकर
चलते बने
मैं वहीं खड़ा रहा
देखता रहा
तुम्हारी राह
पर तुम नहीं आए

तुम सर्दियों में गए थे

पक्के मकान में
अब मुझमें तुम्हें देने के लिए
गरमाहट न थी
तुम्हारे नहीं होने से
मुझे भी गरमाहट का
अहसास न ता
इसलिए मैं
ठिठुरता रहा...

गर्मियां आई

लू के थपेड़ों 
और धूल भरी आंधियों ने
धीरे धीरे
कूंचे पानी से बनी हुई छान को
कर दिया शुरू उधेड़ना
और फैला दिया
बेतरतीब सा फैडों को
मेरे सर के ऊपर
भर गई धूल उन बातियों के बीच

बरसात के मौसम में

मैंने जब नहाना शुरू किया
तो कहीं से उड़कर आए
बेल के बीजों ने
उगकर जकड लिया मुझे
रोक दिया बिखरने से

लेकिन वह भी कब तक

रोक पाती
बरसात गई
वह भी सूख गई
फिर सर्दी आई
बसंत और पतझड़ भी आए
लेकिन अब मुझमें
नहीं था साहस
और बिखर गया
इस बार की गरमी में
उधड़ गई छान
और गिर गया बळिंडा
अब मैं भी कर रहा हूं 
इंतज़ार 
फिर से बरसात का
ताकि गिरा दे वह
पौठे और भींत को
और मिल जाउं मैं 
फिर से धरा में

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूं! 



-----------

सरदार 
30.08.2019

Saturday, August 24, 2019

जंगल सू जे बात चाली छी

जंगल सूं या बात चाली छी
आ पोंहची मैदानां म्
बात सुणी जद् मैदानां न्
दौड् पड्या जंगल मांय्
जार् देख्या जद् जंगल कू तो
लाई लगेडी मली वांह
काई हुयो या जंगल कू जे
उजाड हो गया घर कूंचा
खोद दिया डूंगर सारा
पाड् दिया रोंखडा सारा
जंगल सू जे बात चाली छी
पोंहच गई मैदाना मं

असमंजस म मैदान हुअ्या
कयां बुझाव ई लाई कू
बढ री छ धीर् धीर् जे
मैदानां क मांई कू
आज जंगल तड्कई मैदान
काल लील जावगा समंदरा कू
सूख गई नदियां अर नाळा
मर जावगी मछल्यां ताळाबां की
जंगल सूख्या मर गया जंदावर
कुआ सूखैगा मनख मरैगा
जद् आंख्या खुलैगी मैदानां की

जंगल सू जे बात चाली छी
पोंहच गई मैदानां तक
दोड् पड्या सगळा मनख जंदावर
लड्बा कू लाई लगाबाळा सू
लोग लूगायां बूढा अर बाळक
सब का सब उठ खड़ा हुअ्या
देख तमाशो पीठ फेरगा
जंगल कू आग लगाबाळा सब




सरदार २४.८.१९



Friday, August 23, 2019

गांव देख रहा है

गांव देख रहा है 
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गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
कभी पानी के लिए
कभी खाने के लिए

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
कभी हवा के लिए
कभी दाने के लिए

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
कभी मिट्टी के लिए
कभी बजरी के लिए

गांव देख रहा है
शहर आ उसकी ओर आ रहा है
उसे नोंचने के लिए
उसे खाने के लिए

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
धुआँ उड़ाते हुए
जहर उगलते हुए

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
जंगल मिटाने के लिए
पेड़ काटने के लिए

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
नहर का गला घोंटने
नदी का रास्ता रोकने

गांव देख रहा है
शहर उसकी ओर आ रहा है
संकर बीज खपाने के लिए
दवा का जहर पिलाने के लिए

गांव देख रहा है
गांव देख रहा है
पहले खुश होता था
अब हर पल रोता है
शहर से पीछा छुड़ाने के लिए
दूर कहीं जाने के लिए


गांव देख रहा है
बस गांव देख रहा है

सरदार
23.08.2019
प्रेमपुरा 

Saturday, August 10, 2019

पीपळ का पेड़ तळ

पीपळ का पेड़ क तळ
रोज सुवांर
बाबो झांकतो रहच
घरां मांई
कद बकरी आवगी घरां सूं
अर पत्ता खावगी

ळार ही वांकू
तलाश रहव छ म्हारी कि
मं बकरी कू घेरतो
ले जाऊं उ खन्या
अर वा मोसू कई बातां कर

म्हार अर बकरी क पाछ
काळू भी बाबा खन
पहूंच जाव छ
क्यूं कि वा भी दो पतासा बाबा सू
रोजीना पाव छ

पेड, म बैठी गुल्यावड़ी
अर गुरगळी
भी आ जाव छ अपणो अपणो
हिस्सो मांगबा
अर मिलबा प खा पीर
चली जावं छ

म्ह रोजीना देखूं छूं
या सब सुवांर
पर बाकी दन, अर दन
आंथतो को देख सकूं
पण सारी बात सुंवारई
बाबो बता दे च मोकू

म भी रोजीना
सुंवार होबा की
बाट नाहलतो रहवूं छूं
की कद बाबा सूं मलूंगो
गुल्यावड़ी अर गुरगुळी सूं मळूंगो.

जोहार


9 अगस्त 2019 

Friday, July 19, 2019

प्रतिरोध करें

तुम दस की बात करते हो
उन्होंने सैकडों मारे हैं
आज तीन सौ की भीड़ है
कल हजारों की संख्या में मारेंगे

सदियों से उनका है यही चलन
जो रास्ते से हटा नहीं
उसे जान तक से मार देते हैं
तुम्हें सोनभद्र ही दिखता है
पूरा छतीसगढ़ पूरा झारखंड
पूरा उड़ीसा पूरा आंध्र प्रदेश
पूरा भारत देश ही मारा है
कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण
पश्चिम से लेकर पूर्वोत्तर तक
हर रोज मारते आए हैं

फिर आज यह इतना कोहराम क्यों
झूठा यह विलाप क्यों
अभी तुम तक नहीं पहूंची
लपट यह
तब तक चुप्पी साध लो तुम
मरने दो जो भी मरता है
अपना कब क्या जाता है

हमारा प्रदेश भिन्न
बोली भाषा और पहनावा भिन्न
इसीलिए रह गए दूर दूर
नहीं सुनते हमारे कान वह क्रंदन
जब मरता है कोई झारखंड में
जब लूटती है अस्मत छत्तीसगढ़ में
हम चुप रहते हैं उड़ीसा पर
आंखें बंदकर लेते हैं इन हालात पर
फिर सोनभद्र को तो रोना ही था
इन हालातों को तो होना ही था

कहीं गोंड कहीं खड़िया का भेद
कहीं मीणा कहीं मुंडा का भेद
भूमिज खासी गालो आदि भूमिज
निशी कहीं आपातानी का भेद
कहीं दिशा कहीं भूमि का भेद
कभी मिट भी नही सकता है यह
हर जगह पर अपनी सब ही हैं श्रेष्ठ

फिर भी समय की यह दरकार है कि
सब साथ उठें और विरोध करें
प्रतिरोध का जो स्वभाव है
उसको मुखर और बुलंद करें
वरना मिटना तो है ही इक दिन
तब तक तो आत्म-सम्मान के लिए लडें

सरदार
19 व 20 जुलाई, 2019

Thursday, July 18, 2019

वह दौड़ रही है

वह दौड़ रही है
लगातार दौड़ रही है
दौड़े ही जा रही है
और दौड़ पूरी होने के बाद
लहरा कर हवा में
अपने हाथों को
सारे जहाँ को समेट लेती है
अपने आगोश में
गर्व के साथ
गले में लटकाकर
अखोमिया गमछा
जो उसकी संस्कृति का हिस्सा है
वह भूलती नहीं
अपनों को

वह जीत रही है
सबसे तेज दौड़कर
लेकिन तब भी
आंसू हैं उसकी आंखों में
यह आंसू
जीतने की खुशी के हैं
कि
अपने जैसे लोगों की
गुमनामी के हैं
जिसे पूरा देश
नकार रहा है
और गूगल पर
उसकी जाति ढूंढ रहा है

जब वह दौड़ रही थी
पूरी ताकत से
तभी प्रकृति भी
बरस रही थी
पूरी ताकत से
डूबो देने को
उसका घर आंगन
तरबतर करके पानी से
बेहाल कर देने को
सारा जनजीवन
वह दूर परदेश से
नहीं भूलती
भेजना मदद
अपने लोगों को
और हम उसकी इस
सिर्फ ताली बजाएंगे
क्योंकि वह दौड़ रही है देश के लिए
वह दौड़ रही है
अपनी पहचान के लिए
जिसे सब मिटा देना चाहते हैं

लेकिन उसे दौड़ना है
यह दौड़ उसका नसीब है
जैसे कि उसके पुरखों का नसीब था
पता नहीं कब रूकेगा
यह दौड़ना
जिसे पीछे छोड़ देने को
वह दौड़ रही है
लगातार दौड़ रही है....


(हिमा दास के लिए)


सरदार
19.07.2019

Monday, May 20, 2019

बचपन की गाड़ी

पुरानी चप्पल को काटने पर
दो अदद पहिए
बन जाते थे
फिर उन पहियों को साथ लाने के लिए
धुरी के रूप में
ढूंढते थे सरकंडो की पेलियां
सपकंडे की धुरी पर
कुएं पर से चुराई जाती थी
पानी के किर्लोस्कर इंजन से
रबड़ की नळकी
जिसके बीच में करके ठेक
फंसा देते थे
एक लंबा सा फैडा़
जिसके दूसरे छोर पर
होती थी चप्पल को काटकर बनाई गई गोल बंगड़ी
और जब तैयार हो जाती थी
हमारी यह गाड़ी
हम सबसे अमीर
सबसे खुश
चलाते थे इतरा कर
कभी-कभी पीछे
जुड़ी होती थी
मिट्टी से बनी ट्रोली
जिसमें होती थी मिट्टी
भरत करने के लिए.

इस गाड़ी के अलावा जब
कभी मिल जाते थे
नरम लोहे
या सिलोर के नरम तार
तो गाड़ी बनाने में पारंगत
किसी साथी से
बनवाते थे
तार की गाड़ी
और बनवाने की मजदूरी
रख लेता था वह
तार का एक हिस्सा
जिसे बेचकर
मतीरे वाले मोटे खटीक से
मतीरा खाया जाता था.

ऐसे ही मौजमस्ती में
बिना पांव में चप्पलों के
निकल जाता था
उंधाळा
कभी कभी जून की
तेज धूप में
दाद जाती थी पगथलियां
और बन जाती थी
छलौड़ी
तो
कभी टूट जाते थे
गेहूं के फांसे
और बबूल के कांटे
जिनको निकालने के एवज में
पड़ते थे चांटे
और खूब सारी डांट.

ऐसे ही निकलती थी
गरमी की छुट्टियां
और हम अगली छुट्टियों के लिए
लगे रहते थे तार कबाड़ने
और पुरानी चप्पलों को
सहेजकर रखने में

अहा! वह प्यारा बचपन
और हमारी तार और
चप्पल से बनी गाड़ी।


सरदार
20.05.2019

Wednesday, May 15, 2019

पेड़ और हम

जब भी तुम्हें जरूरत होती है
मेरे पास आ जाते हो
तुम्हें छाया चाहिए
तुम्हें भोजन चाहिए
तुम्हें पानी चाहिए
तुम्हें दवा चाहिए या
तुम्हें जीवन चाहिए
तुम मेरे पास आ जाते हो

मैं पेड़ हूँ
कभी तुम उगाते हो
कभी खुद ही उग आता हूँ
उगने के लिये
मुझे चाहिए भी क्या
अंगुल भर से भी कम जमीन
एक कतरे से भी कम पानी
फिर जीवन भर
तलाश में पानी की
अपनी जड़ों को गहरा करता जाता हूँ
और भोजन के लिए
अपनी शाखाओं को फैलाता जाता हूँ
जब शाखाओं पर पते लगते हैं
वह मुझे भी
और तुम्हें भी
भोजन देते हैं
जडो़ और पत्तों के बीच में
यह तना
मजबूती से बांधे रखता है
जड़ों को और पत्तों को।

कभी हम भी
ऐसे ही जुड़े रहते थे
एक दूसरे से
एक दूसरे के लिये
लेकिन अब तुम मुझसे दूर जाने लगे हो
तुम्हें रास्तों को सुगम बनाने के लिए
मुझे रास्ते से हटाना पड़ जाता है
तुम्हें अपने घरों में ईमारती लकड़ी के लिए
मुझे काटना, चीरना पड़ जाता है
मैं तुम्हारे रास्ते में बाधा क्यों बन गया हूं
जबकि पहले तो हम संगी साथी थे
तुम एक के बदले
कई पेड़ लगाते थे
बरसाती दिनों में तुम्हारे कंधों पर कुदाल
और हाथों में पौधे हुआ करते थे
मुझे जानवरों से बचाते थे
तेज आंधियों से बचाते ते
फिर यह समय का
कैसा फेर है साथी
ना तुम मुझे चाहते हो
ना खुद को चाहते हो!

फिर से
बरसात का मौसम
आने वाला है
दूर पड़ी कुदाल तुम्हारा इंतजार कर रही है
मेरी जड़ों में बिखरे बीज समेटो
और बिखेर दो इन्हें
दूर दूर तक
आवाज दो हरियल पक्षी को
कबूतर और बकरी को
वह दें तुम्हारा साथ
मेरे बीज फैलाने में।

मैं ही हूँ तुम्हारा असली दोस्त
तुम्हारा असली संरक्षक
तुम मुझे सहेजो
मैं तुम्हें सहेजता हूं
ताकि
हमारी जो पीढ़ियाँ
आने को आतुर हैं
गर्व कर सकें हम पर
और सहेज सकें
एक दूसरे को
एक दूसरे के लिये।

जोहार
सरदार
(मध्य रात्रि, 15 व 16 मई, 2019)

Monday, May 6, 2019

मैं नई कोंपल हूँ बाबा

मैं नई कोंपल हूँ बाबा
अपनी छांव में रहने दो

अभी तो दुनिया देखी भी नहीं है
कुछ रोज तो मुझ को जीने दो

रोज सुबह सो कर उठती हूं तो
सर पर हाथ तुम रहने दो

सूरज की तपती किरणों से
अपनी बाहों में छुपने दो

बरसात का जब मौसम आएगा
रिमझिम बारिश में भीगेंगे

खुशी से मैं चहकूंगी बाबा
तुम खेतों का रूख करना

सर्दी गर्मी बारिश सबमें
बाबा साथ सदा रहना

मेरा जीवन तुम्हारे हाथ में है
मुझसे कभी दूर मत होना



सरदार
6.5.19

Saturday, April 13, 2019

एक आदिवासी लड़की

तुम आ गई हो
कब से इंतज़ार था तुम्हारा
एक आदिवासी लड़की

तुम आई हो
कली सी बनकर
मासूम सी, खुशी बनकर

तुम्हारा साथ
सबको नई रौशनी देगा
बाबा और जीजी को नई उम्र देगा

आओ बिटिया
तुम्हारा स्वागत है
मैं तुम्हारा ताऊ तुम्हारा दोस्त

सरदार

Friday, April 12, 2019

वह जो आने वाला है


वह जो आने वाला है घर में
अपनी किलकारियों को लेकर
सब उसके स्वागत को आतुर हैं
घर पर दादी और मौसी
दिखा रही हैं अपने अनुभवों का कौशल
और बहुत बेचैन है
उसका पिता
कल से जब असहज सा
महसूस किया है संतोष ने
वह बार बार बुला लेता है मुझे
हम दर्द बढ़ने को लेकर
उत्सुक हैं
और यह दर्द बढ़कर जन्म देंगे
एक नई रौशनी को
जो तेज हवा और बरसात से
लड़कर जगमगाएगी
और लाएगी घर में खुशहाली
वह जो आने वाली रौशनी है
वह भी तो उत्सुक होगी
देखने को यह चकाचौंध भरी दुनिया
जो बस चली जा रही है
आ जा ओ नन्हें मुसाफिर
तेरा बड़ा काका, दादा, दादी
और बड़ा दादा, दादी
सब इंतज़ार में हैं
देख यह नई सुबह की
रौशनी
और बढ़ा अपनी किलकारियों से
हर किसी के मन में
खुशियों का कोलाहल
आ देख सब की आंखों
में तेरे हिस्से का
प्यार।
सरदार

Thursday, April 11, 2019

गांव के कांकड पर रोडिड़े का पेड़




मेरे गांव के कांकड पर
एक रोहिडे़ का पेड़ अकेला है
बचपन से देखता आ रहा हूं
उसे अकेले ही खडे़
बबूल और नीम के पेडो़ से
अपने अकेलेपन पर बतियाते हुए
उससे कुछ दूरी पर
एक आम का पेड़ भी है
वह भी अकेला है
लेकिन जैसे ही हर पतझड़ में
उस पर बगर लगते हैं
गांव के बच्चे आने लगते हैं
उसका अकेलापन दूर करने के लिए
और बगरों के बीच
आने वाली छोटी-छोटी कैरियों
को ताड़ने लगते हैं
इन्हीं मासूम बच्चों में से कोई
उठा कर ढीम
लगाता है निशाना
तो कोई इंतजार करता है
जेठ में चलने वाले अंधडों का
जिससे कैरी टूटकर गिरे
और अपनी खटास से
रोमांचित करदे बच्चों को
दूर खड़ा रोहिड़ा का पेड़
देखता रहता है यह सब
और सुनता रहता है
अपने खोखले तने में बने
मोखले में से सांय सांय निकलती
झगर को
कुछ फूल जो हवा के आलिंगन से
झड़ गए हैं
उठा ले जाते हैं वह बच्चे
और दे देते हैं अपनी बहन को
बालों में लगाने के लिए
अकेलेपन से आजीज
रोहिड़ा का पेड़
मुस्कुरा देता है
उसके साथ में खिलखिला पड़ते हैं
नीम और बबूल के पेड़
उन पर भी लग आए हैं
बगर और फूल और
जल्द ही लग जाएंगे
पातडे़ और निमोलियां
पातड़ों से बनेंगे कंगन और कुंडल
और निमोलियां बनेंगी बोरला
पकने पर मीठी पीली निमोली को
आम कहकर चूखने का मजा लेते बच्चों
को देखकर
नीम अपनी कडवाहट भूल जाएगा
और बबूल भी पैने नुकीले काँटों को
सीने से लगा लेगा
बहुत खुश होते हैं
गांव के कांकड़ पर खड़े वह
आम, नीम, बबूल और
पलाश के पेड़
बच्चों की खुशियों में वह भी
हैं शामिल
मेरे गांव के कांकड़ का खुशहाल
वह कोना
पूरे गांव की खुशहाली
का है द्दौतक

अहा! यह मेरे
गांव का कांकड़

Sunday, April 7, 2019

मेरा जोहार रहेगा

मैं पहाड़ के
छलनी होते, रोंद दिये गये
सीने से उड़ती धूल हूं
तुमने उजाड़ दिया मेरा घर
फिर भी ओ मेरी अस्मत के सौदागर
तुमको मेरा जोहार रहेगा।
मैं उड़ रही हूं
क्योंकि
जिस पत्थर ने मुझे
लगा रखा था अपने सीने से
उसे उपाड़ लिया है तुमने
फिर भी तुमको मेरा
जोहार रहेगा
तुम अपनी जेबों में भरकर
जंगल से उधार लिये
कागज के टुकड़ों को
मुझे उड़ा रहे हो
और मैं बनकर एक गुबार
कहीं दूर चली जा रही हूँ
अपने घर से
फिर भी तुमको मेरा
जोहार रहेगा
तुमको सबको दिखाने के लिए
जोहार बोलते हो
और गले लगकर डूंगर की
पीठ में घुसेड़ कर खंजर
उसे रोज मारते हो
फिर भी तुमको मेरा
जोहार रहेगा
तुम डकार गए सारे डूंगर को
आदिवासियत को मारकर ठोकर
और कर दिए टुकड़े टुकड़े
फिर भी क्रेशर के मुंह में
दहाड़ रहे भाटों का
तुमको जोहार रहेगा
तुमको कोई रोके तो
कहते हो
खरीद लिया है तुमने यह डूंगर
पैसों के लिये बिक गए थे
तुम जैसे वह सब
और सारे जज्बात तुम्हारे
फिर उजड़े डूंगर का
तुमको जोहार रहेगा
हर पल की मौत के आगे
लज्जित से होते हैं सब
जब पान की पीक थूंककर
जोहार बोलते हो तुम तो
तुम थूक कर हम सब पर
आगे को बढ़ जाते हो
फिर भी हम सबका
तुमको जोहार रहेगा
मैं उडूंगी और देखूंगी
वह छोटे छोटे लाश के टुकडे़
देखें कहां ले जाते हो ढोकर
और कर लूंगी उनका आलिंगन
रूंधे गले से रोज लिपटकर
फिर भी तुम जैसों को मेरा
मरकर भी जोहार रहेगा।
सरदार

Thursday, March 28, 2019

बेटी की जिद

बेटी जिद कर रही है
बाबा मुझे नये कपड़े दिला दे
सलवार सूट पहन कर
स्कूल जाऊंगी
मुझको नये कपड़े दिला दे

पहन के घघरी बडी हो गई
सबकी नजरें चोर हो गई
स्कूल में डेरा डाले वह बाहरी काका
उसकी नजरें गिद्ध सी हो गई
डर लगता है जब वह घूरता है तो
सिर से पांव तक सिहर जाती हूं
बाबा मुझे दिलवादो कपड़े
कहते हैं सब मैं बड़ी हो गई

बाबा ने धरती को देखा
नजर चूरा कर अंबर को देखा
कैसी यह बिटिया ख्वाहिश कर बैठी
मुझसे अपनी मौत मांगती
दिला तो दूं बिटिया तु जो भी मांगती 
सलवार सूट क्या जो तुझे भाए
लेकिन वह सरकारी भेड़िए 
और स्कूल में डेरा डाले वह 
बाबू
तुझे माओवादी कहेंगे 
नक्सली बताकर मार ही देंगे 

बोलो कैसे तुम्हें पहनाऊं
जो तु चाहे वह दिलवाऊं
तेरे जैसी गांव की सारी बेटियां 
चाहती हैं सलवार सूट पहनना
लेकिन उन बाबुओं का क्या करें
जो अपनी नाकामी हम पर हैं थोपते
देख कैसे दिल नहीं पसीजता 
इनके घर में भी तो होंगी ना बेटियां 
क्या वह भी यूं ही मार दी जाती होंगी
कपडों से ही पहचानी जाती होंगी

बिटिया सब कुछ समझ चुकी थी 
बापू के आंसू बह कर सूख चुके थे
डर उसका अब खो गया कहीं पर
आंखें भी भरकर डबडबा आई थी
बाबा मुझे नहीं कुछ और चाहिए 
लेकिन कोई तो राह बताइये 
कैसे उन नजरों से बचें हम
हर वक्त नस्तर सी जो चुभती जाएं
क्या छोड़ दूं अब स्कूल जाना मैं
घर पर ही रहकर मां का हाथ बटाऊं
बोलो बाबा क्या करूं मैं बोलो
कुछ तो बाबा अब तो बोलो

Monday, March 25, 2019

प्रेम

कहीं सुना था
प्रेम खत्म नहीं होता है
फिर यह भी सुना कि
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है

फिर मैं सोचूं
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है
फिर प्रेम कहां से आता है
नहीं अंकुर उगे इस प्रेम के तो
फिर खत्म कहां से होगा यह

मन द्वंद में था
उद्वेलित था
जो हममें था वह कब जन्मा था
जो मरता गया हम देखते रहे
गर खत्म हुआ तो प्रेम न था
और आज भी है तो जन्मा कब था

बड़ी उलझन मन में थी बसी
यह पहेली कभी बुझी ही न थी
जो जन्मा नहीं वह मरा कहां
पिर बिन जन्मे वह हुआ ही क्यों
यह प्रेम अगर होता ही नहीं
क्या जन्मता और क्या मरता यहां


सरदार 

Friday, March 22, 2019

वह जंगल लूटने आए हैं



वह जंगल लूटने आए हैं
हरे-पीले गहरे रंग केकपड़े पहने
कंधे पर बंदूक सजाए
वह जंगल लूटने आए हैं

आगे आगे बंदूक लिए वह
उनके पीछे
सफेद कपडों में
हमारे द्वारा ही चुने गए नेताजी हैं
और उनके पीछे
सूट बूट में, आंखों काला पर काला चश्मा चढ़ाए
वह लाला हैं, जो नेताजी के मालिक हैं
वह जंगल लूटने आए हैं

जंगल के बीच से
जब वह निकल रहे हैं
खपरैल के नीचे खड़ा वह बच्चा
कातर नजरों से देख रहा है
उन हरे-पीले कपडों से सजे
मशीनी इंसान को
जिसने अपने बेटे की
अच्छी शिक्षा के लिए,
मेडल और पैसे के लिए
उसके बाबा को उठा लिया था रास्ते से
और नक्सली बताकर
जंगल की ओर दौड़ाकर मार दिया था,
वह जंगल लूटने आए हैं।

बाबा के मरने पर
यह सफेद कपड़ों वाले आए थे
मुंह लटकाकर, 
और कह गये थे कि वह मदद करेंगे
किसने मारा है तुम्हारे बाबा को
और बैठकर गाड़ी में
धूल उड़ाते वापस चले गए
महंगी सिगरेट का धुआं उड़ाते
वह जंगल लूटने आए हैं

हरे भरे लंबे ऊंचे सखुआ के पेड़
सब जानते हैं
लेकिन वह भी मजबूर हो गए हैं
किसको बताएं अपने मन की व्यथा
जो इनकी बातें मानते थे
इन्हें समझते और जानते थे, 
कहीं दूर चले गए हैं
या तो मार दिए गए हैं
या डरा दिए गए हैं
लेकिन एक दिन मरना तो होगा ही
वहां से हटना तो होगा ही
क्योंकि
वह जंगल लूटने आए हैं।


Friday, March 1, 2019

तंबाकू

आप जर्दा, तंबाकू, खैनी या पान मसाला इसलिए खरीदकर चबाते हैं क्योंकि देसी तंबाकू से आपको असभ्य हो जाने का खतरा है
आप खरीददार हैं, वह बाजार हैं
आप अब लाचार हैं वह आप के दम पर दमदार हैं
देसी से किसी को आज तक कैंसर नहीं हुआ
पैक्ड तंबाकू पर सुरक्षा चेतावनी लिखी होती है, फिर भी आप चबाते हैं, लेकिन फिर भी आपकी सभ्यता आपको कैंसर से नहीं बचा पाती
आपको डिब्बों, प्लास्टिक रेपर्स में बंद करके कैंसर बेचा जा रहा है वह भी किश्तों में...
जोहार

आप हैं बथुआ, यानि कि Chenopodium Album
आप विटामिन ए के अच्छे स्रोत हैं
आप आयरन यानि कि लोह तत्व के भंडार हैं
यकृत, वृक्क, त्वचा समेत शरीर का ऐसा कौन सा अंग है जिसे आप फायदा नहीं पहुंचाते
भूख बढ़ाना, दाग धब्बों से छुटकारा, पथरी का निवारण, कृमिनाशक, इत्यादि में आपका अमूल्य योगदान हैं
और हां वह मैनस्ट्रीम वाले बच्चों के पेट में कीड़े मारने के लिए एल्बंडाजोल खिलाते हैं ना, कभी बथुए का साग खिलाओ, बच्चा भी स्वस्थ रहेगा और कृमिउन्मूलन भी होगा... कम से कम बच्चे को जहर तो नहीं देना पड़ेगा
कंधे के दर्द में भी यह बहुत फायदेमंद है, पीसकर लेप लगालो और साग भी खालो
जोहार प्रकृति
जोहार बथुआ

यह कविता मैंनें अंडमान जाने के दो दिन पहले २ सितंबर को लिखी थी लेकिन इसका वास्तविक संबंध कार्यशाला के दौरान मालूम चला है
शीर्षक : जंगल में यह कौन घुसा है 
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आंखें सूख गई हैं
दिल यह खौफजदा है
धरती थर थर कांपे
संगीनें बेफिक्र यहां हैं
पंछी चुप चुप से हैं
हवा भी रूक सी गई है
जंगल में यह कौन घूसा है
झींगुर सब खौफजदा हैं
नदियां सब सूख गई हैं
झरने सब थम से गए हैं
चली वह गोली कहीं पर
सांस कोई थम गई है
डर कर वह काले बादल
बरसना भूल गए हैं
भूखा बच्चा मनखे का
रोना भी भूल गया है
सीने की दिखती पसलियां
पेट से दिखती रीढ़ है
हरे नीले कपडे़ पहने
राह कोई भूल गया है...
सूखा वह पोखर जिसमें
मछली दम तोड़ चुकी हैं
बैठा किनारे पर बगुला
भूख से बिलख रहा है
पेड़ पर भयभीत गोरैया
गिद्ध से पूछ रही है
कौन यह बापर्दा है
नंगे को मार रहा है
कोटर में बैठा तोता
बडी ही दुविधा में है
आज वह चुप है तो फिर
टें टें कौन कर रहा है
रेंग कर चलता अजगर
बडी असमंजस में है
कौन यह रेंग रहा है
आग यह उगल रहा है
गीदड़ को दुख तो बडा है
चतुर वह कहलाता है
कागज के टुकड़े गिनता
चालाकी कोई कर ही रहा है
भीतर से भयभीत है वह भी
जिसके हाथों में खंजर है
कौन यह तड़प रहा है
किसे वह मार रहा है

Thursday, February 28, 2019

चलो युद्ध करो

तुम डाल डाल
हम पात पात
चलो युद्ध करो
मुझे चुकाना कर्ज
तुम देना वोट
चलो युद्ध करो
मैं हूं गुलाम
बिक चुका तमाम
चलो युद्ध करो
कर लाखों करार
हो जाऊं फरार
चलो युद्ध करो
सिर पर आए चुनाव
नहीं मुझको वक्त
चलो युद्ध करो
तुम कटो मरो
चाहे जो भी हो
चलो युद्ध करो

Wednesday, February 27, 2019

जंगल के हालात

वह अपने घरों को
रंगवा रहे हैं
अपने मन पर रंगे रंगों से
किसी ने दीवारों पर
जंगल के गीत लिखे हैं
किसी ने छापे हैं
जंगल के लुटेरों की आकृति

ऐसे ही एक घर की
घायल दीवार पर
बनाया है उन्होंने
मृत जंगल से भरा ट्रक और
जमीन खोदता पोकलेन
और बता रहा है पीड़ा
उस लाल जमीन की जिसे
और भी लाल कर दिया है
हुकूमत और लाल निशान ने

एक आदिवासी लड़का
लिख रहा था
मुल्क की सबसे बड़ी कचहरी
का न्याय
आदिवासियों के अधिकारों की ईबारतें
क्यों कि
उसने पढ़ लिया है उस शीर्षस्थ कचहरी का
वह खूनी न्याय
कि यह जंगल और जमीन
अब नहीं है तुम्हारा

वह जमीन जहां
उसके पुरखे जन्में
और मिल गए उसी में समय के बहाव में
जो छीन ली जाएगी उनसे
यह कहकर कि
तुम नहीं साबित कर पाए
इस पर अपना अधिकार
अपने पुरखों का इतिहास

वह रंग रहे हैं
घरों की दीवारों को
दिखाना चाहते हैं
अंधी दुनिया को
अपने घाव, कि
यह जंगल और जमीन
हमारा है
हमारे पुरखों ने सींचा है
इसे
अपने खून से

©सरदार

Thursday, February 21, 2019

जंगल का कानून

उन्होंने कमर कस ली है
प्रकृति को उजाड़ने की

प्रकृति को उजाड़ने के लिए ही
एक किताब लिखी
किताब के पन्ने भी
बांस की लकड़ी से बनी लुग्दी के थे

उन्होंनें कलम चलाकर
किताब में कुछ अध्याय लिख दिए
कमाल देखिए, कलम भी
लकड़ी की बनी थी

कलम में जो स्याही थी
वह भी उन्होंने नील के पौधे से उधार ली थी
यह कहकर की हम
तुम्हारे हित के लिए नियम बनाएंगे

नील के पौधे ने सहर्ष
दे दिया अपना सब कुछ
यह सोचकर की इससे
उसका और उसके जैसों का हित होगा

इंसान ने नील को कूटकर
उसका रस निकाला
बांस को कूटकर कागज बनाया
और लिख दिया जंगल का कानून

अब जंगल में जो भी होगा
किताब में लिखे अनुसार होगा
पेड़ उगेंगे तो मानने होंगे उन्हें
इंसान के बनाए जंगल के कानून

इंसान जो इन जंगलों के दिए
अन्न हवा और जल से पले बढ़े
आज खत्म कर देना चाहते हैं
इन जंगल और इसमें रहने वाले जीवों को

जंगल का कानून
जंगल से निकले कागज और स्याही से
जंगल के लिए ही नियम बना दिया
जीना है हमारी शर्तों से मरना है हमारी शर्तों से

बांस और नील चुप हैं
स्तब्ध हैं इंसान की चालाकी से
कैसे उसने ठग लिया उसके भोलेपन को
सांस लेना भी मुश्किल कर दिया उनका

यह जंगल का कानून है
जिसे जंगल ने नहीं
इंसान ने बनाया है
जंगल को इंसान जैसा बनाने के लिए

Wednesday, January 9, 2019

आदिवासियत

दो भाईयों में राड़ कराणी हो तो उनसे भेदभाव करना शुरू करदो

कुछ ऐसा ही हुआ अंग्रेजों व अंग्रेजों के बाद के भारत में...

राज्यों का सीमांकन

आदिवासी समुदायों का विभिन्न राज्यों में असमान रूप से वर्गीकरण

आदिवासी समुदायों को जातियों में बांटना

आदिवासी समुदायों को धर्म का झुनझुना पकड़वा देना

सामुदायिक राजनैतिक प्रतिनिधित्व करने वाले राजनेताओं को दलगत राजनीति का गुलाम बनाना

आर्थिक रूप से असमानताएं

विभिन्न भौगोलिक, पारिस्थितिक, आर्थिक विषमताओं को दरकिनार करना

और सबसे अहम जो पृथक से पांचवीं और छठवीं अनुसूची की बात की गयी
सीधे सीधे पूर्वोत्तर क्षेत्र के आदिवासियों को, शेष भारत के आदिवासियों से पृथक बना दिया गया

हम सोचते हैं कि आज अगर पांचवीं और छठवीं अनुसूची लग जाए तो कल्याण हो जाए, लेकिन आदिवासी अधिकार केवल एकसमान रूप से आदिवासी माने जाने पर ही सुरक्षित रहेंगे

आदिवासी समुदायों को स्वायत्तता का अधिकार देना

राज्यों की सीमाओं के पार सोचना पड़ेगा

सबकी अपनी अपनी लड़ाई है मगर, हैं सब एक ही पेड़ की शाखाएं...

#आदिवासियत
#Adivasidom