Friday, July 19, 2019

प्रतिरोध करें

तुम दस की बात करते हो
उन्होंने सैकडों मारे हैं
आज तीन सौ की भीड़ है
कल हजारों की संख्या में मारेंगे

सदियों से उनका है यही चलन
जो रास्ते से हटा नहीं
उसे जान तक से मार देते हैं
तुम्हें सोनभद्र ही दिखता है
पूरा छतीसगढ़ पूरा झारखंड
पूरा उड़ीसा पूरा आंध्र प्रदेश
पूरा भारत देश ही मारा है
कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण
पश्चिम से लेकर पूर्वोत्तर तक
हर रोज मारते आए हैं

फिर आज यह इतना कोहराम क्यों
झूठा यह विलाप क्यों
अभी तुम तक नहीं पहूंची
लपट यह
तब तक चुप्पी साध लो तुम
मरने दो जो भी मरता है
अपना कब क्या जाता है

हमारा प्रदेश भिन्न
बोली भाषा और पहनावा भिन्न
इसीलिए रह गए दूर दूर
नहीं सुनते हमारे कान वह क्रंदन
जब मरता है कोई झारखंड में
जब लूटती है अस्मत छत्तीसगढ़ में
हम चुप रहते हैं उड़ीसा पर
आंखें बंदकर लेते हैं इन हालात पर
फिर सोनभद्र को तो रोना ही था
इन हालातों को तो होना ही था

कहीं गोंड कहीं खड़िया का भेद
कहीं मीणा कहीं मुंडा का भेद
भूमिज खासी गालो आदि भूमिज
निशी कहीं आपातानी का भेद
कहीं दिशा कहीं भूमि का भेद
कभी मिट भी नही सकता है यह
हर जगह पर अपनी सब ही हैं श्रेष्ठ

फिर भी समय की यह दरकार है कि
सब साथ उठें और विरोध करें
प्रतिरोध का जो स्वभाव है
उसको मुखर और बुलंद करें
वरना मिटना तो है ही इक दिन
तब तक तो आत्म-सम्मान के लिए लडें

सरदार
19 व 20 जुलाई, 2019

Thursday, July 18, 2019

वह दौड़ रही है

वह दौड़ रही है
लगातार दौड़ रही है
दौड़े ही जा रही है
और दौड़ पूरी होने के बाद
लहरा कर हवा में
अपने हाथों को
सारे जहाँ को समेट लेती है
अपने आगोश में
गर्व के साथ
गले में लटकाकर
अखोमिया गमछा
जो उसकी संस्कृति का हिस्सा है
वह भूलती नहीं
अपनों को

वह जीत रही है
सबसे तेज दौड़कर
लेकिन तब भी
आंसू हैं उसकी आंखों में
यह आंसू
जीतने की खुशी के हैं
कि
अपने जैसे लोगों की
गुमनामी के हैं
जिसे पूरा देश
नकार रहा है
और गूगल पर
उसकी जाति ढूंढ रहा है

जब वह दौड़ रही थी
पूरी ताकत से
तभी प्रकृति भी
बरस रही थी
पूरी ताकत से
डूबो देने को
उसका घर आंगन
तरबतर करके पानी से
बेहाल कर देने को
सारा जनजीवन
वह दूर परदेश से
नहीं भूलती
भेजना मदद
अपने लोगों को
और हम उसकी इस
सिर्फ ताली बजाएंगे
क्योंकि वह दौड़ रही है देश के लिए
वह दौड़ रही है
अपनी पहचान के लिए
जिसे सब मिटा देना चाहते हैं

लेकिन उसे दौड़ना है
यह दौड़ उसका नसीब है
जैसे कि उसके पुरखों का नसीब था
पता नहीं कब रूकेगा
यह दौड़ना
जिसे पीछे छोड़ देने को
वह दौड़ रही है
लगातार दौड़ रही है....


(हिमा दास के लिए)


सरदार
19.07.2019