Saturday, December 31, 2022

मेरे मन में खरसावाँ था


और दिनों की तरह, आज भी ठंड थी

मैं रजाई से बाहर निकला
भोर हो चुकी थी
धूप के इंतजार में
मैं, बगर और केमर
पड़े रहे रजाई में

सुबह की सर्द हवा
अब हमारे साथ थी
मैं बाहर निकला तो
सब अपने काम में व्यस्त थे

दादी कऊ पर हाथ सेंक रही थी
मां भैंसो के आड्या में थी
घेगरी अपनी नई गुड़िया से बात कर रही थी
मैं भी
जैकेट में हाथ डालकर
खेत की ओर चल पड़ा

मोबाइल चालू किया तो
टूं टूं करके मैसेज आने लगे
मैं जानता था कि एकाध दोस्त के अलावा
सब नये साल की बधाई व शुभकामनाएं हैं

मैं खेत की डोळ पर ताप रहे
अपने कुटुम्ब के कुछ साथियों के बीच पहुंचा
ओस और ठंड के अलावा
आज नहाया जाए या नहीं
यही चर्चा चल रही थी

थोड़ी देर रूककर
मैं बाबा के पास चला आया
बाबा कभी बकरियों से बात करते तो
कभी गिलहरी और गाय से
मैं भी चुपचाप सब सुनता रहा

ऐसी ही होती है हमारे यहां
रोज की सुबह
किसी ने भी नये साल का जिक्र नहीं किया था
मैं भी नहीं करना चाहता था
मेरे मन में खरसावां था
खरसावां के राजा के द्वारा
74 साल पहले
किया गया गोलीकांड आंखों के आगे था
एक वीभत्स दृश्य 
हज़ारों की संख्या में मारे गये 
आदिवासियों की मृत देह थी।


1.1.23

Thursday, October 13, 2022

आशियाना

न कोई नोटिस दिया न कोई समझाइश की
बस धड़ाम से गिरा दिया उसका आशियाना
उसे बर्बाद होने की खबर तब लगी
जब अंडो के फूटने और पड़ोसी की गिरने से मौत हुई
कुछ उड़ नहीं पाए
कुछ तो संभल ही नहीं पाए
अंडों को बचाने की चाहत में
खुद भी मारे गए 
तब उन्हें अहसास हुआ
 
लेकिन उनको
कोई नोटिस नहीं मिला
न कोई आखिरी चेतावनी
बस गुर्र्र् गुर्र्र् करती आरी चली
और मिनटों में ही
सालों पुराना पेड़ आकर गिर पड़ा

कुछ मरे पड़े, और घायल पंछियों को देखकर
अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे थे
कि बेजुबानों का घर उजड़ गया...
बेजुबान कहां हैं
कांव कांव टें टें
चीं चीं कर तो रहे हैं वह
अब तुम ही न सुनो तो वह भी क्या करें
तुम्हारी संवेदना तो है कि घर उजड़ गया
लेकिन तुम समझे ही नहीं कि घर को उजाड़ा गया है
वह भी बिना किसी नोटिस के
बिना किसी पंछी की अनुमति के

रूको थोड़ी देर के लिए तुम्हारा रास्ता रोका है गिरे हुए पेड़ ने
ऑह! सॉरी 
काटे गए पेड़ ने... 

देखा! कभी तुम गिरा हुआ पेड़, 
कभी काटा हुआ पेड़ कहते हो
और अभी कुछ देर पहले उसे 
पंछियों का आशियाना कह रहे थे... 
कितनी जल्दी बदल जाते हैं न तुम्हारे लिए 
शब्द 
बहुत वृहद है न तुम्हारा शब्दकोश 
उससे भी कहीं वृहद है तुम्हारी खामोशी 
चलो! 
हट गया है आशियाना 
ऑह! सॉरी 
काटा गया पेड़
बिना किसी नोटिस के
बिना किसी मुआवजे के। 

सरदार
14.10.2022

Wednesday, October 12, 2022

कडुल्या

कड़ा (कडुल्या) क लिया पांव काट दिया
सुणबा म घणी ही बुरी लाग पण
देखबा म भी घणी बुरी या बात
हर दस पांच दन मं सुणबा कू मिल् आजकल

जीजी कहती रहव् अस्सी भर्या सौ भर्या
कडुल्या है उका
कणकती खंगाली पोंच कांटा बोरला चटकी
अर जाण कांई कांई पहरती वा
अर साथ मं गोदणा
गोरी खाल प काला गोदणा
अर चांदी का गहणा
जीजी का मन को सो सुहावणो रूप... 

... यां तांई 
काल ही लिख दी छी
फेर काम क आग् लिख ही कोन पायो
आज चनीसो टेम मल्यो तो 
एक अखबार देख्यो
खबर छी
जमना न जमानो देख्यो 
पण
जमना जीजी न बच सकी
मर गी
... 
मारबाळा न कडुल्या की ताणी
पहल्या गळो काट्यो
फेर पग काट दिया

पण फेर भी आपणो करजो कोन चुका पायो

मं सोच रहयो छो कि 
वा या न सोच्यो कि म्हारी जीजी भी तो सी ही हैगी

पण कडुल्या का चक्कर मं
सब भूल गो
जीजी न भी अर जामण न भी.... 
11-13/10/2022
सरदार 

Friday, October 7, 2022

तुम्हारे साथ

जब मैं तुमको देख रहा था
तब मैं किसी और को भी देख रहा था
तुमसे तुलना कर रहा था
तुमसे कम-ज्यादा देख रहा था

नुक्स निकालने की यह
मेरी पुरानी आदत होगी शायद
जब मैं तुम्हारे साथ था लेकिन 
किसी और का साथ देख रहा था

प्रेम में पड़ा हुआ आदमी
कोई एकाकीपन का शिकार नहीं था
प्रेमिका के साथ में भी वह
खुद का साथ देख रहा था

बिना स्वार्थी बने
प्रेम करना मुश्किल था
तुम्हारे आस-पास
खुद की कल्पनाओं को देख रहा था


सरदार 
04.10.22


Sunday, September 18, 2022

आदिवासियत की पौध

धीरे-धीरे ढ़हने लगती हैं
वह ईमारतें
जिनमें कोई नहीं रहता
कहीं प्लसतर गिरता है
कहीं छत उधड़ती है
कहीं मुखडोली गिरती है
तो कहीं से पानी रिसता है।

दरार जब दीवारों में पड़ती है
उग आते हैं
पंछियों के छोड़े गए बीज उनमें
और लेने लगते हैं गिरफ्त में
अपनी जड़ों के
उस जर्जर ईमारत को।

ऐसी ही मजबूत-सी दिखने वाली
मगर कमजोर ईमारत की जद में
गिरफ्तार है मेरा समुदाय
और बंद पाता है
खुद को
जहां न कोई खिड़की है
न बाहर को जाने का दरवाजा।

कुछ लोग रंग रहे हैं अपने खून से इसे
और कुछ
लगे हैं दीवारों को दरकाने में
थोड़ा सा सरकाने में
कोशिश कर रहे हैं
कहीं से तो सरकेगी
थोड़ा सा तो दरकेगी
ताकि
उगाया जा सके
रोपा जा सके
एक आदिवासियत का पौधा
जो जिंदा कर सके इस समुदाय को।

मेरा आह्वान है कि
जोर तो लगाओ
यह गिरेगी
भरभराकर गिरेगी
बनो पौध
बढ़ाओ अपनी जड़ें
धंस जाओ एक-एक ईंट में
हिला दो नींव को
उतार दो इसका यह प्लस्तर
उदेड़ दो इसकी छतें
और बढ़ने दो आदिवासियत का यह पौधा
जिसे कुम्हला दिया है
पीढ़ियों की खामोशी ने...

सरदार
18.09.2022

Friday, September 16, 2022

मेरी जंगली पढ़ाई

मैं किताबों से दूर भागता था
सब से नहीं
सिलेबस की किताबों से
मैं वही क्यों पढूं
जो उनमें लिखा है. 

इम्तिहान की रात को
मेरा मन फैज अहमद फैज़ को पढ़ने का हुआ
तो वह मुझे एनाटॉमी की किताब में मिलेंगे क्या
मुझे इतनी बंदिश वाली
पढ़ाई से दूर जाना ही था. 

ऐसी ही एक रात
मैं कोई कविता पढ़ रहा था
मन में नई जिन्दगी के सपने गढ़ रहा था
लेकिन दूसरे दिन
मुझे क्लास में खड़ा कर दिया गया
क्यों कि मैं
ऑरगेनॉन की एफॉरिज्म नहीं सुना पाया था. 

ऐसे कौन सजा देता है
मेरे मन में होगा तब पढ़ लूंगा
तुम्हारी दुनिया में अपने महल गढ़ लूंगा
अभी तो मुझे
पत्थलगढ़ी में से
'हिंसक होंगे भले आदमी
बेघर होंगे घास के बीज'
समझने दो ना
या फिर तुम समझा दो.

मैंने मेडिकल और होम्योपैथी की किताबों के बीच
आदिवासी साहित्य को खड़ा कर दिया है
अब आओ तुम
मैं सुनाऊंगा तुम्हें
जंगल के गीत
आदिवासियत से लबरेज जीजी के किस्से-कहानियां
फिर तुम नहीं कर पाओगे मुझे
क्लास में खड़ा
क्योंकि मैं खड़ा हूं
जंगल में
जहां पर तुम जाने से डरते हो

आओ ना
सांय सांय करती हवा को सुनो
पतों से बातें करती डालों को सुनो
नदी से बात करते पहाड़ों को सुनो

मुझे तुम्हारे सिलेबस से नहीं
अपने मन से पढ़ने दो
झरनों से गिरते पानी से
बात करने दो.

28.07.22

आदमियत

आदमी ने अपनी 'आदमियत' को जिंदा रखने के लिए
ईश्वर को 'जन्म' दिया है
और यह आदमियत पुरूष और महिला के
अस्तित्व से कहीं अलग है
इसमें पुरूष होने का 'दम्भ' तो है,
लेकिन वह मजबूत होने की बजाय जर्जर है
इस आदमियत का मसीहा
'मसीही-विहीन' है
वह ईश्वर तो है,
लेकिन उसके साथ ईश्वरी नहीं है
वह प्रभू है, 
लेकिन उसके साथ कोई प्रभूई नहीं है
वह परमपिता है
लेकिन उसके साथ कोई परममाता नहीं है
वह अल्लाह भी है
लेकिन उसके साथ कोई अल्लाही नहीं है
यह भाषाई अकाल है या आदमी का दम्भ है
आदमी के इसी दम्भ ने उसे
प्रकृति से दूर किया है
प्रकृति जहां एक साम्य में रहती है
वहीं आदमियत एक कोरी
'परिकल्पना' बनकर रह जाती है
जो ताकतवर तो है
लेकिन ताकतवरी नहीं बन पाती।
फिर यह आदमियत 
कहीं पर भी 'बालसुलभ' नहीं हो पाती
हम बालमन की बातें इससे नहीं कर पाते
भौतिक सुखों के लाभ और लोभ
से युक्त यह आदमियत
इंसान और इंसानी का फर्क नहीं बता पाती
फर्क क्या, वह अपने दम्भ के कारण
इंसानी को जन्म ही नहीं दे पाती
हम जब भी आदमियत की
इस जन्म न दे पाने की कमजोरी पर
अंगुली उठाते हैं
तो अंगुली की रक्षार्थ कोई 'अंगुला' भी नहीं पाते हैं
इस तरह से हम देखते हैं कि
कुदरत के इस 'कुदरती' आदमी ने
ईश्वर, प्रभू, परमपिता और अल्लाह तो बना दिए, 
पर कोई ईश्वरी, प्रभूई, परममाता और अल्लाही
न बनाकर
भाषाई अकाल के इस दम्भ और दौर में 
हमेशा के लिए उसे अकेला छोड़ दिया।


सरदार 
17.09.2022

Sunday, January 30, 2022

महक

सुबह नींद खुलते ही
मैनें खिड़की से मां को निहारा
चाय लेकर आती पत्नी को देखा 
आंगन को बुहारती छोटी बहू को देखा 
चूल्हे के आगे बैठकर आग से तपती जीजी को देखा 
और बगल की मेज पर रखे मोबाइल से बेटी को देखने के लिए 
वीडियो कॉल कर दिया

सब एक-दूसरे की जिंदगी में
खुशियां भरते
घर-आंगन में खुशियां बिखेरते
अपने-अपने काम में मशगूल हैं

बेटी ने फोन की स्क्रीन पर 
चिड़िया की तरह चहकते हुए 
ढूंढा़डी बोली को मराठी के लहजे में पूछा 
बड़े पापा निका हो न
मैं जवाब में मुस्कुरा कर कुछ बोलता
उससे पहले ही
चाय का कप रखकर विजय चहक उठी 
और पूछा बेटी से
गुन्नू, जीजी के घर कब आवगी? 

बिटिया बोलती तब तक
बगर भी जाग चुका था 
और स्क्रीन पर चहक रही बहन को देखकर बोला
आजा
हम सब हंस दिए 
जीजी भी चूल्हे के आगे से उठकर
फोन के पास आ गई 
और बोली
बेटी, घरां कद आवगी? 

मां ने मेरे हाथ से 
फोन लेकर, बगर को गोद में उठाकर 
छोटी बहू को दे दिया
और सब चूल्हे की आग के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गईं 
मैं दूर खड़ा
सबके चहकने की आवाजें सुनता रहा
घर की खुशियां मुझे बेफिक्र कर रहीं थी
आधी आबादी का हंसना-मुस्कुराना
आते हुए बसंत का स्वागत करते
सरसों के पीले फूलों के सौंदर्य और महक को
घर के आंगन में 
नीम के पत्तों से छनकर आते
उजाले के साथ उतार रहा था। 


Tuesday, January 25, 2022

सरकार, कम्पनी और सभ्य समाज वर्सेज़ आदिवासी

 सभ्य समाज के सहयोग से 

सरकारें कम्पनियों के लिए 

लाल क़ालीन बिछाती हैं 

बदले में कम्पनियाँ 

सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।


हम आदिवासी 

मुँह ताकते रहते हैं 

इंतज़ार में रहते हैं 

कि कम्पनियों को सरकार रोकेगी 

पर नहीं समझ पाते कि 

कम्पनियाँ, सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।


सरकारों के इशारे पर 

सभ्य समाज के कुछ 

सभ्य और भद्र जन 

आदिवासियों को असभ्य कहते हैं 

और दिन रात सभ्य बनाने की जुगत में लगे रहते हैं।


सभ्य बनाना चाहते हैं 

क्यूँ कि कम्पनियों ने आदेश दिया है सरकारों को 

ज़मीन ख़ाली कराने का, 

जंगल ख़ाली कराने का 

बिना सभ्य हुए कैसे आदिवासी 

ज़मीन छोड़ेंगे 

जंगल छोड़ेंगे 


सरकारें फ़रमान निकालती हैं

ज़मीनें ख़ाली कराती हैं 

कंपनियो को लाती हैं

सभ्यों को अपनी मेहनत का मेहनताना देती हैं 

और आदिवासी!

आदिवासी भूल जाते हैं कि,

कम्पनियाँ, सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।




२६ जनवरी, २०२२ बुद्धवार