Thursday, April 11, 2019

गांव के कांकड पर रोडिड़े का पेड़




मेरे गांव के कांकड पर
एक रोहिडे़ का पेड़ अकेला है
बचपन से देखता आ रहा हूं
उसे अकेले ही खडे़
बबूल और नीम के पेडो़ से
अपने अकेलेपन पर बतियाते हुए
उससे कुछ दूरी पर
एक आम का पेड़ भी है
वह भी अकेला है
लेकिन जैसे ही हर पतझड़ में
उस पर बगर लगते हैं
गांव के बच्चे आने लगते हैं
उसका अकेलापन दूर करने के लिए
और बगरों के बीच
आने वाली छोटी-छोटी कैरियों
को ताड़ने लगते हैं
इन्हीं मासूम बच्चों में से कोई
उठा कर ढीम
लगाता है निशाना
तो कोई इंतजार करता है
जेठ में चलने वाले अंधडों का
जिससे कैरी टूटकर गिरे
और अपनी खटास से
रोमांचित करदे बच्चों को
दूर खड़ा रोहिड़ा का पेड़
देखता रहता है यह सब
और सुनता रहता है
अपने खोखले तने में बने
मोखले में से सांय सांय निकलती
झगर को
कुछ फूल जो हवा के आलिंगन से
झड़ गए हैं
उठा ले जाते हैं वह बच्चे
और दे देते हैं अपनी बहन को
बालों में लगाने के लिए
अकेलेपन से आजीज
रोहिड़ा का पेड़
मुस्कुरा देता है
उसके साथ में खिलखिला पड़ते हैं
नीम और बबूल के पेड़
उन पर भी लग आए हैं
बगर और फूल और
जल्द ही लग जाएंगे
पातडे़ और निमोलियां
पातड़ों से बनेंगे कंगन और कुंडल
और निमोलियां बनेंगी बोरला
पकने पर मीठी पीली निमोली को
आम कहकर चूखने का मजा लेते बच्चों
को देखकर
नीम अपनी कडवाहट भूल जाएगा
और बबूल भी पैने नुकीले काँटों को
सीने से लगा लेगा
बहुत खुश होते हैं
गांव के कांकड़ पर खड़े वह
आम, नीम, बबूल और
पलाश के पेड़
बच्चों की खुशियों में वह भी
हैं शामिल
मेरे गांव के कांकड़ का खुशहाल
वह कोना
पूरे गांव की खुशहाली
का है द्दौतक

अहा! यह मेरे
गांव का कांकड़

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