Friday, April 11, 2025

कौन हैं यह लोग



 उन्हें जल अच्छा लगता है 
उन्हें जंगल अच्छे लगते हैं
उन्हें उन्हें ज़मीन अच्छी लगती है
लेकिन वह आदिवासी नहीं हैं
लेकिन फिर भी उन्हें
जल जंगल जमीन भाते हैं

कौन हैं यह लोग
जो जल जंगल जमीन से
इतना प्यार करते हैं
कि आदिवासियों को
और जंगल के वाशिंदों को
बेदख़ल कर रहे हैं जंगलों से
और बता रहे हैं ख़ुद को
जंगल के असली दावेदार

इनकी नज़रों में
क्या है आदिवासियत की परिभाषा
क्या है सहजीविता
क्या है जैव-विविधता
क्या है सहकार
क्या बताना चाहते हैं यह?

जंगल के ख़ून से भिगोकर अपने हाथ
जंगल के ख़ून से करके अपने जबड़े लाल
पहन के जंगल के वाशिंदों के कटे हुए सरों की माला
कौन हैं ये
जो कर रहे हैं ख़ुद का रक्ताभिषेक
लिख रहे हैं जंगल की वसीयत अपने नाम
लूट रहे हैं कुदरत की दौलत बेहिसाब 


७/४/२५
सोमवार

Saturday, December 21, 2024

मैं एक आदिवासी हूँ

मैं एक आदिवासी हूँ 

मैं एक आदिवासी हूँ

मुझे एक आदिवासी के नाम से जाना जाए

सदियों से मैं इस धरा पर

रह रहा हूँ 

जल जंगल जमीन

और यहां के तमाम

पशु-पक्षी पेड़-पौधे मेरे साथी हैं

सिर खुला आसमान

आसमान के तारे-सितारे

नीचे बहती बल खाती नदियां

ऊँचे-नीचे पहाड़ और डूंगर

फसलों से सजे

खेत और खलिहान

यह सब मेरे साथी हैं


मैं एक आदिवासी हूँ

सभ्य-असभ्य के शाब्दिक खेल

मुझे समझ नहीं आते हैं

सियासतों के फैलाये भ्रम के गलियारों में

मैं उलझ कर रह जाता हूँ

कोई मुझे वनवासी कहता है

कोई जनजाति कहता है

लेकिन मैं क्या कहना चाहता हूँ?

यह कोई नहीं सुनना चाहता

सब अपनी सहूलियत के हिसाब से

मुझे समझाना चाहते हैं कि हम तुम्हारे साथी हैं

हम तुम्हें जीना सिखाएँगे

तुम्हारी संस्कृति की रक्षा करेंगे

हम तुम्हें राजनीतिक और आर्थिक संरक्षण देंगे!


और बदले में क्या देंगे?

यह बताते नहीं हैं

कि उन्हें जल जंगल जमीन चाहिये

हमारी छोटी-सी जेब भरकर

खुद जल जंगल जमीन के मालिक बन जाना चाहते हैं

हम आदिवासियों को सत्ता में मामूली सा

दिखावे का हक देकर

हमारे पांवों के तले से जमीन ले लेना चाहते हैं|


और इसमें उनका साथ देते हैं

हमारे ही कुछ लोग

बिक जाते हैं

या बिछ जाते हैं उनके गलियारों में

सत्ता की विष-पोषित रोटियां खाने


और मैं आदिवासी

चुपचाप देखता रहता हूं

जल से भरे बांधों और सूखती हुई नदियों को

ट्रकों में भरकर जाते हुए जंगलों को

अपने पांवों के नीचे से जाती हुई जमीन को

और तब भी

मैं लड़ता आ रहा हूँ

उन सबसे और कुछ अपनों से

ताकि बची रहे जल जंगल और जमीन

बची रहे मेरी पहचान

कि मैं एक आदिवासी हूँ…


22122024

सरदार



Saturday, December 31, 2022

मेरे मन में खरसावाँ था


और दिनों की तरह, आज भी ठंड थी

मैं रजाई से बाहर निकला
भोर हो चुकी थी
धूप के इंतजार में
मैं, बगर और केमर
पड़े रहे रजाई में

सुबह की सर्द हवा
अब हमारे साथ थी
मैं बाहर निकला तो
सब अपने काम में व्यस्त थे

दादी कऊ पर हाथ सेंक रही थी
मां भैंसो के आड्या में थी
घेगरी अपनी नई गुड़िया से बात कर रही थी
मैं भी
जैकेट में हाथ डालकर
खेत की ओर चल पड़ा

मोबाइल चालू किया तो
टूं टूं करके मैसेज आने लगे
मैं जानता था कि एकाध दोस्त के अलावा
सब नये साल की बधाई व शुभकामनाएं हैं

मैं खेत की डोळ पर ताप रहे
अपने कुटुम्ब के कुछ साथियों के बीच पहुंचा
ओस और ठंड के अलावा
आज नहाया जाए या नहीं
यही चर्चा चल रही थी

थोड़ी देर रूककर
मैं बाबा के पास चला आया
बाबा कभी बकरियों से बात करते तो
कभी गिलहरी और गाय से
मैं भी चुपचाप सब सुनता रहा

ऐसी ही होती है हमारे यहां
रोज की सुबह
किसी ने भी नये साल का जिक्र नहीं किया था
मैं भी नहीं करना चाहता था
मेरे मन में खरसावां था
खरसावां के राजा के द्वारा
74 साल पहले
किया गया गोलीकांड आंखों के आगे था
एक वीभत्स दृश्य 
हज़ारों की संख्या में मारे गये 
आदिवासियों की मृत देह थी।


1.1.23

Thursday, October 13, 2022

आशियाना

न कोई नोटिस दिया न कोई समझाइश की
बस धड़ाम से गिरा दिया उसका आशियाना
उसे बर्बाद होने की खबर तब लगी
जब अंडो के फूटने और पड़ोसी की गिरने से मौत हुई
कुछ उड़ नहीं पाए
कुछ तो संभल ही नहीं पाए
अंडों को बचाने की चाहत में
खुद भी मारे गए 
तब उन्हें अहसास हुआ
 
लेकिन उनको
कोई नोटिस नहीं मिला
न कोई आखिरी चेतावनी
बस गुर्र्र् गुर्र्र् करती आरी चली
और मिनटों में ही
सालों पुराना पेड़ आकर गिर पड़ा

कुछ मरे पड़े, और घायल पंछियों को देखकर
अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे थे
कि बेजुबानों का घर उजड़ गया...
बेजुबान कहां हैं
कांव कांव टें टें
चीं चीं कर तो रहे हैं वह
अब तुम ही न सुनो तो वह भी क्या करें
तुम्हारी संवेदना तो है कि घर उजड़ गया
लेकिन तुम समझे ही नहीं कि घर को उजाड़ा गया है
वह भी बिना किसी नोटिस के
बिना किसी पंछी की अनुमति के

रूको थोड़ी देर के लिए तुम्हारा रास्ता रोका है गिरे हुए पेड़ ने
ऑह! सॉरी 
काटे गए पेड़ ने... 

देखा! कभी तुम गिरा हुआ पेड़, 
कभी काटा हुआ पेड़ कहते हो
और अभी कुछ देर पहले उसे 
पंछियों का आशियाना कह रहे थे... 
कितनी जल्दी बदल जाते हैं न तुम्हारे लिए 
शब्द 
बहुत वृहद है न तुम्हारा शब्दकोश 
उससे भी कहीं वृहद है तुम्हारी खामोशी 
चलो! 
हट गया है आशियाना 
ऑह! सॉरी 
काटा गया पेड़
बिना किसी नोटिस के
बिना किसी मुआवजे के। 

सरदार
14.10.2022

Wednesday, October 12, 2022

कडुल्या

कड़ा (कडुल्या) क लिया पांव काट दिया
सुणबा म घणी ही बुरी लाग पण
देखबा म भी घणी बुरी या बात
हर दस पांच दन मं सुणबा कू मिल् आजकल

जीजी कहती रहव् अस्सी भर्या सौ भर्या
कडुल्या है उका
कणकती खंगाली पोंच कांटा बोरला चटकी
अर जाण कांई कांई पहरती वा
अर साथ मं गोदणा
गोरी खाल प काला गोदणा
अर चांदी का गहणा
जीजी का मन को सो सुहावणो रूप... 

... यां तांई 
काल ही लिख दी छी
फेर काम क आग् लिख ही कोन पायो
आज चनीसो टेम मल्यो तो 
एक अखबार देख्यो
खबर छी
जमना न जमानो देख्यो 
पण
जमना जीजी न बच सकी
मर गी
... 
मारबाळा न कडुल्या की ताणी
पहल्या गळो काट्यो
फेर पग काट दिया

पण फेर भी आपणो करजो कोन चुका पायो

मं सोच रहयो छो कि 
वा या न सोच्यो कि म्हारी जीजी भी तो सी ही हैगी

पण कडुल्या का चक्कर मं
सब भूल गो
जीजी न भी अर जामण न भी.... 
11-13/10/2022
सरदार 

Friday, October 7, 2022

तुम्हारे साथ

जब मैं तुमको देख रहा था
तब मैं किसी और को भी देख रहा था
तुमसे तुलना कर रहा था
तुमसे कम-ज्यादा देख रहा था

नुक्स निकालने की यह
मेरी पुरानी आदत होगी शायद
जब मैं तुम्हारे साथ था लेकिन 
किसी और का साथ देख रहा था

प्रेम में पड़ा हुआ आदमी
कोई एकाकीपन का शिकार नहीं था
प्रेमिका के साथ में भी वह
खुद का साथ देख रहा था

बिना स्वार्थी बने
प्रेम करना मुश्किल था
तुम्हारे आस-पास
खुद की कल्पनाओं को देख रहा था


सरदार 
04.10.22


Sunday, September 18, 2022

आदिवासियत की पौध

धीरे-धीरे ढ़हने लगती हैं
वह ईमारतें
जिनमें कोई नहीं रहता
कहीं प्लसतर गिरता है
कहीं छत उधड़ती है
कहीं मुखडोली गिरती है
तो कहीं से पानी रिसता है।

दरार जब दीवारों में पड़ती है
उग आते हैं
पंछियों के छोड़े गए बीज उनमें
और लेने लगते हैं गिरफ्त में
अपनी जड़ों के
उस जर्जर ईमारत को।

ऐसी ही मजबूत-सी दिखने वाली
मगर कमजोर ईमारत की जद में
गिरफ्तार है मेरा समुदाय
और बंद पाता है
खुद को
जहां न कोई खिड़की है
न बाहर को जाने का दरवाजा।

कुछ लोग रंग रहे हैं अपने खून से इसे
और कुछ
लगे हैं दीवारों को दरकाने में
थोड़ा सा सरकाने में
कोशिश कर रहे हैं
कहीं से तो सरकेगी
थोड़ा सा तो दरकेगी
ताकि
उगाया जा सके
रोपा जा सके
एक आदिवासियत का पौधा
जो जिंदा कर सके इस समुदाय को।

मेरा आह्वान है कि
जोर तो लगाओ
यह गिरेगी
भरभराकर गिरेगी
बनो पौध
बढ़ाओ अपनी जड़ें
धंस जाओ एक-एक ईंट में
हिला दो नींव को
उतार दो इसका यह प्लस्तर
उदेड़ दो इसकी छतें
और बढ़ने दो आदिवासियत का यह पौधा
जिसे कुम्हला दिया है
पीढ़ियों की खामोशी ने...

सरदार
18.09.2022