एक आदिवासी
Friday, April 11, 2025
कौन हैं यह लोग
Saturday, December 21, 2024
मैं एक आदिवासी हूँ
मैं एक आदिवासी हूँ
मैं एक आदिवासी हूँ
मुझे एक आदिवासी के नाम से जाना जाए
सदियों से मैं इस धरा पर
रह रहा हूँ
जल जंगल जमीन
और यहां के तमाम
पशु-पक्षी पेड़-पौधे मेरे साथी हैं
सिर खुला आसमान
आसमान के तारे-सितारे
नीचे बहती बल खाती नदियां
ऊँचे-नीचे पहाड़ और डूंगर
फसलों से सजे
खेत और खलिहान
यह सब मेरे साथी हैं
मैं एक आदिवासी हूँ
सभ्य-असभ्य के शाब्दिक खेल
मुझे समझ नहीं आते हैं
सियासतों के फैलाये भ्रम के गलियारों में
मैं उलझ कर रह जाता हूँ
कोई मुझे वनवासी कहता है
कोई जनजाति कहता है
लेकिन मैं क्या कहना चाहता हूँ?
यह कोई नहीं सुनना चाहता
सब अपनी सहूलियत के हिसाब से
मुझे समझाना चाहते हैं कि हम तुम्हारे साथी हैं
हम तुम्हें जीना सिखाएँगे
तुम्हारी संस्कृति की रक्षा करेंगे
हम तुम्हें राजनीतिक और आर्थिक संरक्षण देंगे!
और बदले में क्या देंगे?
यह बताते नहीं हैं
कि उन्हें जल जंगल जमीन चाहिये
हमारी छोटी-सी जेब भरकर
खुद जल जंगल जमीन के मालिक बन जाना चाहते हैं
हम आदिवासियों को सत्ता में मामूली सा
दिखावे का हक देकर
हमारे पांवों के तले से जमीन ले लेना चाहते हैं|
और इसमें उनका साथ देते हैं
हमारे ही कुछ लोग
बिक जाते हैं
या बिछ जाते हैं उनके गलियारों में
सत्ता की विष-पोषित रोटियां खाने
और मैं आदिवासी
चुपचाप देखता रहता हूं
जल से भरे बांधों और सूखती हुई नदियों को
ट्रकों में भरकर जाते हुए जंगलों को
अपने पांवों के नीचे से जाती हुई जमीन को
और तब भी
मैं लड़ता आ रहा हूँ
उन सबसे और कुछ अपनों से
ताकि बची रहे जल जंगल और जमीन
बची रहे मेरी पहचान
कि मैं एक आदिवासी हूँ…
22122024
सरदार
Saturday, December 31, 2022
मेरे मन में खरसावाँ था
Thursday, October 13, 2022
आशियाना
Wednesday, October 12, 2022
कडुल्या
Friday, October 7, 2022
तुम्हारे साथ
Sunday, September 18, 2022
आदिवासियत की पौध
धीरे-धीरे ढ़हने लगती हैं
वह ईमारतें
जिनमें कोई नहीं रहता
कहीं प्लसतर गिरता है
कहीं छत उधड़ती है
कहीं मुखडोली गिरती है
तो कहीं से पानी रिसता है।
दरार जब दीवारों में पड़ती है
उग आते हैं
पंछियों के छोड़े गए बीज उनमें
और लेने लगते हैं गिरफ्त में
अपनी जड़ों के
उस जर्जर ईमारत को।
ऐसी ही मजबूत-सी दिखने वाली
मगर कमजोर ईमारत की जद में
गिरफ्तार है मेरा समुदाय
और बंद पाता है
खुद को
जहां न कोई खिड़की है
न बाहर को जाने का दरवाजा।
कुछ लोग रंग रहे हैं अपने खून से इसे
और कुछ
लगे हैं दीवारों को दरकाने में
थोड़ा सा सरकाने में
कोशिश कर रहे हैं
कहीं से तो सरकेगी
थोड़ा सा तो दरकेगी
ताकि
उगाया जा सके
रोपा जा सके
एक आदिवासियत का पौधा
जो जिंदा कर सके इस समुदाय को।
मेरा आह्वान है कि
जोर तो लगाओ
यह गिरेगी
भरभराकर गिरेगी
बनो पौध
बढ़ाओ अपनी जड़ें
धंस जाओ एक-एक ईंट में
हिला दो नींव को
उतार दो इसका यह प्लस्तर
उदेड़ दो इसकी छतें
और बढ़ने दो आदिवासियत का यह पौधा
जिसे कुम्हला दिया है
पीढ़ियों की खामोशी ने...
सरदार
18.09.2022
