यह कविता मैंनें अंडमान जाने के दो दिन पहले २ सितंबर को लिखी थी लेकिन इसका वास्तविक संबंध कार्यशाला के दौरान मालूम चला है
शीर्षक : जंगल में यह कौन घुसा है
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आंखें सूख गई हैं
दिल यह खौफजदा है
दिल यह खौफजदा है
धरती थर थर कांपे
संगीनें बेफिक्र यहां हैं
संगीनें बेफिक्र यहां हैं
पंछी चुप चुप से हैं
हवा भी रूक सी गई है
हवा भी रूक सी गई है
जंगल में यह कौन घूसा है
झींगुर सब खौफजदा हैं
झींगुर सब खौफजदा हैं
नदियां सब सूख गई हैं
झरने सब थम से गए हैं
झरने सब थम से गए हैं
चली वह गोली कहीं पर
सांस कोई थम गई है
सांस कोई थम गई है
डर कर वह काले बादल
बरसना भूल गए हैं
बरसना भूल गए हैं
भूखा बच्चा मनखे का
रोना भी भूल गया है
रोना भी भूल गया है
सीने की दिखती पसलियां
पेट से दिखती रीढ़ है
पेट से दिखती रीढ़ है
हरे नीले कपडे़ पहने
राह कोई भूल गया है...
राह कोई भूल गया है...
सूखा वह पोखर जिसमें
मछली दम तोड़ चुकी हैं
मछली दम तोड़ चुकी हैं
बैठा किनारे पर बगुला
भूख से बिलख रहा है
भूख से बिलख रहा है
पेड़ पर भयभीत गोरैया
गिद्ध से पूछ रही है
गिद्ध से पूछ रही है
कौन यह बापर्दा है
नंगे को मार रहा है
नंगे को मार रहा है
कोटर में बैठा तोता
बडी ही दुविधा में है
बडी ही दुविधा में है
आज वह चुप है तो फिर
टें टें कौन कर रहा है
टें टें कौन कर रहा है
रेंग कर चलता अजगर
बडी असमंजस में है
बडी असमंजस में है
कौन यह रेंग रहा है
आग यह उगल रहा है
आग यह उगल रहा है
गीदड़ को दुख तो बडा है
चतुर वह कहलाता है
चतुर वह कहलाता है
कागज के टुकड़े गिनता
चालाकी कोई कर ही रहा है
चालाकी कोई कर ही रहा है
भीतर से भयभीत है वह भी
जिसके हाथों में खंजर है
जिसके हाथों में खंजर है
कौन यह तड़प रहा है
किसे वह मार रहा है
किसे वह मार रहा है

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