कहीं सुना था
प्रेम खत्म नहीं होता है
फिर यह भी सुना कि
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है
फिर मैं सोचूं
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है
फिर प्रेम कहां से आता है
नहीं अंकुर उगे इस प्रेम के तो
फिर खत्म कहां से होगा यह
मन द्वंद में था
उद्वेलित था
जो हममें था वह कब जन्मा था
जो मरता गया हम देखते रहे
गर खत्म हुआ तो प्रेम न था
और आज भी है तो जन्मा कब था
बड़ी उलझन मन में थी बसी
यह पहेली कभी बुझी ही न थी
जो जन्मा नहीं वह मरा कहां
पिर बिन जन्मे वह हुआ ही क्यों
यह प्रेम अगर होता ही नहीं
क्या जन्मता और क्या मरता यहां
सरदार
प्रेम खत्म नहीं होता है
फिर यह भी सुना कि
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है
फिर मैं सोचूं
जो आता है वह जाता है
जो जन्मता है वह मरता है
फिर प्रेम कहां से आता है
नहीं अंकुर उगे इस प्रेम के तो
फिर खत्म कहां से होगा यह
मन द्वंद में था
उद्वेलित था
जो हममें था वह कब जन्मा था
जो मरता गया हम देखते रहे
गर खत्म हुआ तो प्रेम न था
और आज भी है तो जन्मा कब था
बड़ी उलझन मन में थी बसी
यह पहेली कभी बुझी ही न थी
जो जन्मा नहीं वह मरा कहां
पिर बिन जन्मे वह हुआ ही क्यों
यह प्रेम अगर होता ही नहीं
क्या जन्मता और क्या मरता यहां
सरदार

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