Thursday, December 19, 2019

अडिग

वह कहते हैं
तुम यहाँ क्यों जमे हुए हो
पत्थर की तरह
तुम पर किसी भी चीज का
असर क्यों नहीं होता
ना तुम बेईमान हो
ना तुम लालची हो
फिर भी तुम खुश हो
मैं कहता हूं
तुम दिकू हो
मैं आदिवासी हूँ
इसलिए मैं अडिग हूँ
तुम अस्थिर हो
तुम कृत्रिमता पर मरते हो
मैं प्रकृति पर निर्भर हूँ
इसलिए मैं रोज
तुम्हारी आंखों में
पत्थर की मानिंद
चुभता रहता हूँ।
सदियां बीत गई हैं
मेरे पुरखे भी
चुभते थे तुम्हारी आंखों में
वह झुकते नहीं थे
तुम्हारे अन्याय के सामने
बल्कि
खड़े रहते थे
सीना तानकर
वह भी अडिग
और तुम हमेशा भयभीत
डरे सहमे...

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