Thursday, March 28, 2019

बेटी की जिद

बेटी जिद कर रही है
बाबा मुझे नये कपड़े दिला दे
सलवार सूट पहन कर
स्कूल जाऊंगी
मुझको नये कपड़े दिला दे

पहन के घघरी बडी हो गई
सबकी नजरें चोर हो गई
स्कूल में डेरा डाले वह बाहरी काका
उसकी नजरें गिद्ध सी हो गई
डर लगता है जब वह घूरता है तो
सिर से पांव तक सिहर जाती हूं
बाबा मुझे दिलवादो कपड़े
कहते हैं सब मैं बड़ी हो गई

बाबा ने धरती को देखा
नजर चूरा कर अंबर को देखा
कैसी यह बिटिया ख्वाहिश कर बैठी
मुझसे अपनी मौत मांगती
दिला तो दूं बिटिया तु जो भी मांगती 
सलवार सूट क्या जो तुझे भाए
लेकिन वह सरकारी भेड़िए 
और स्कूल में डेरा डाले वह 
बाबू
तुझे माओवादी कहेंगे 
नक्सली बताकर मार ही देंगे 

बोलो कैसे तुम्हें पहनाऊं
जो तु चाहे वह दिलवाऊं
तेरे जैसी गांव की सारी बेटियां 
चाहती हैं सलवार सूट पहनना
लेकिन उन बाबुओं का क्या करें
जो अपनी नाकामी हम पर हैं थोपते
देख कैसे दिल नहीं पसीजता 
इनके घर में भी तो होंगी ना बेटियां 
क्या वह भी यूं ही मार दी जाती होंगी
कपडों से ही पहचानी जाती होंगी

बिटिया सब कुछ समझ चुकी थी 
बापू के आंसू बह कर सूख चुके थे
डर उसका अब खो गया कहीं पर
आंखें भी भरकर डबडबा आई थी
बाबा मुझे नहीं कुछ और चाहिए 
लेकिन कोई तो राह बताइये 
कैसे उन नजरों से बचें हम
हर वक्त नस्तर सी जो चुभती जाएं
क्या छोड़ दूं अब स्कूल जाना मैं
घर पर ही रहकर मां का हाथ बटाऊं
बोलो बाबा क्या करूं मैं बोलो
कुछ तो बाबा अब तो बोलो

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