Sunday, September 18, 2022

आदिवासियत की पौध

धीरे-धीरे ढ़हने लगती हैं
वह ईमारतें
जिनमें कोई नहीं रहता
कहीं प्लसतर गिरता है
कहीं छत उधड़ती है
कहीं मुखडोली गिरती है
तो कहीं से पानी रिसता है।

दरार जब दीवारों में पड़ती है
उग आते हैं
पंछियों के छोड़े गए बीज उनमें
और लेने लगते हैं गिरफ्त में
अपनी जड़ों के
उस जर्जर ईमारत को।

ऐसी ही मजबूत-सी दिखने वाली
मगर कमजोर ईमारत की जद में
गिरफ्तार है मेरा समुदाय
और बंद पाता है
खुद को
जहां न कोई खिड़की है
न बाहर को जाने का दरवाजा।

कुछ लोग रंग रहे हैं अपने खून से इसे
और कुछ
लगे हैं दीवारों को दरकाने में
थोड़ा सा सरकाने में
कोशिश कर रहे हैं
कहीं से तो सरकेगी
थोड़ा सा तो दरकेगी
ताकि
उगाया जा सके
रोपा जा सके
एक आदिवासियत का पौधा
जो जिंदा कर सके इस समुदाय को।

मेरा आह्वान है कि
जोर तो लगाओ
यह गिरेगी
भरभराकर गिरेगी
बनो पौध
बढ़ाओ अपनी जड़ें
धंस जाओ एक-एक ईंट में
हिला दो नींव को
उतार दो इसका यह प्लस्तर
उदेड़ दो इसकी छतें
और बढ़ने दो आदिवासियत का यह पौधा
जिसे कुम्हला दिया है
पीढ़ियों की खामोशी ने...

सरदार
18.09.2022

Friday, September 16, 2022

मेरी जंगली पढ़ाई

मैं किताबों से दूर भागता था
सब से नहीं
सिलेबस की किताबों से
मैं वही क्यों पढूं
जो उनमें लिखा है. 

इम्तिहान की रात को
मेरा मन फैज अहमद फैज़ को पढ़ने का हुआ
तो वह मुझे एनाटॉमी की किताब में मिलेंगे क्या
मुझे इतनी बंदिश वाली
पढ़ाई से दूर जाना ही था. 

ऐसी ही एक रात
मैं कोई कविता पढ़ रहा था
मन में नई जिन्दगी के सपने गढ़ रहा था
लेकिन दूसरे दिन
मुझे क्लास में खड़ा कर दिया गया
क्यों कि मैं
ऑरगेनॉन की एफॉरिज्म नहीं सुना पाया था. 

ऐसे कौन सजा देता है
मेरे मन में होगा तब पढ़ लूंगा
तुम्हारी दुनिया में अपने महल गढ़ लूंगा
अभी तो मुझे
पत्थलगढ़ी में से
'हिंसक होंगे भले आदमी
बेघर होंगे घास के बीज'
समझने दो ना
या फिर तुम समझा दो.

मैंने मेडिकल और होम्योपैथी की किताबों के बीच
आदिवासी साहित्य को खड़ा कर दिया है
अब आओ तुम
मैं सुनाऊंगा तुम्हें
जंगल के गीत
आदिवासियत से लबरेज जीजी के किस्से-कहानियां
फिर तुम नहीं कर पाओगे मुझे
क्लास में खड़ा
क्योंकि मैं खड़ा हूं
जंगल में
जहां पर तुम जाने से डरते हो

आओ ना
सांय सांय करती हवा को सुनो
पतों से बातें करती डालों को सुनो
नदी से बात करते पहाड़ों को सुनो

मुझे तुम्हारे सिलेबस से नहीं
अपने मन से पढ़ने दो
झरनों से गिरते पानी से
बात करने दो.

28.07.22

आदमियत

आदमी ने अपनी 'आदमियत' को जिंदा रखने के लिए
ईश्वर को 'जन्म' दिया है
और यह आदमियत पुरूष और महिला के
अस्तित्व से कहीं अलग है
इसमें पुरूष होने का 'दम्भ' तो है,
लेकिन वह मजबूत होने की बजाय जर्जर है
इस आदमियत का मसीहा
'मसीही-विहीन' है
वह ईश्वर तो है,
लेकिन उसके साथ ईश्वरी नहीं है
वह प्रभू है, 
लेकिन उसके साथ कोई प्रभूई नहीं है
वह परमपिता है
लेकिन उसके साथ कोई परममाता नहीं है
वह अल्लाह भी है
लेकिन उसके साथ कोई अल्लाही नहीं है
यह भाषाई अकाल है या आदमी का दम्भ है
आदमी के इसी दम्भ ने उसे
प्रकृति से दूर किया है
प्रकृति जहां एक साम्य में रहती है
वहीं आदमियत एक कोरी
'परिकल्पना' बनकर रह जाती है
जो ताकतवर तो है
लेकिन ताकतवरी नहीं बन पाती।
फिर यह आदमियत 
कहीं पर भी 'बालसुलभ' नहीं हो पाती
हम बालमन की बातें इससे नहीं कर पाते
भौतिक सुखों के लाभ और लोभ
से युक्त यह आदमियत
इंसान और इंसानी का फर्क नहीं बता पाती
फर्क क्या, वह अपने दम्भ के कारण
इंसानी को जन्म ही नहीं दे पाती
हम जब भी आदमियत की
इस जन्म न दे पाने की कमजोरी पर
अंगुली उठाते हैं
तो अंगुली की रक्षार्थ कोई 'अंगुला' भी नहीं पाते हैं
इस तरह से हम देखते हैं कि
कुदरत के इस 'कुदरती' आदमी ने
ईश्वर, प्रभू, परमपिता और अल्लाह तो बना दिए, 
पर कोई ईश्वरी, प्रभूई, परममाता और अल्लाही
न बनाकर
भाषाई अकाल के इस दम्भ और दौर में 
हमेशा के लिए उसे अकेला छोड़ दिया।


सरदार 
17.09.2022