Friday, August 30, 2019

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूं!

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूँ
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मैं एक ढहता हुआ घर हूं

जब तक मुझमें तुम थे
तब तक मैं जिंदा था
जब तक तुम रहते थे
मैं भी तब रहता था
तुम गए मैं भी जा रहा हूँ

तुम जाते-जाते

किवाड़ों को ओढालकर
चलते बने
मैं वहीं खड़ा रहा
देखता रहा
तुम्हारी राह
पर तुम नहीं आए

तुम सर्दियों में गए थे

पक्के मकान में
अब मुझमें तुम्हें देने के लिए
गरमाहट न थी
तुम्हारे नहीं होने से
मुझे भी गरमाहट का
अहसास न ता
इसलिए मैं
ठिठुरता रहा...

गर्मियां आई

लू के थपेड़ों 
और धूल भरी आंधियों ने
धीरे धीरे
कूंचे पानी से बनी हुई छान को
कर दिया शुरू उधेड़ना
और फैला दिया
बेतरतीब सा फैडों को
मेरे सर के ऊपर
भर गई धूल उन बातियों के बीच

बरसात के मौसम में

मैंने जब नहाना शुरू किया
तो कहीं से उड़कर आए
बेल के बीजों ने
उगकर जकड लिया मुझे
रोक दिया बिखरने से

लेकिन वह भी कब तक

रोक पाती
बरसात गई
वह भी सूख गई
फिर सर्दी आई
बसंत और पतझड़ भी आए
लेकिन अब मुझमें
नहीं था साहस
और बिखर गया
इस बार की गरमी में
उधड़ गई छान
और गिर गया बळिंडा
अब मैं भी कर रहा हूं 
इंतज़ार 
फिर से बरसात का
ताकि गिरा दे वह
पौठे और भींत को
और मिल जाउं मैं 
फिर से धरा में

मैं ढ़हता हुआ कच्चा घर हूं! 



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सरदार 
30.08.2019

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