आदमी ने अपनी 'आदमियत' को जिंदा रखने के लिए
ईश्वर को 'जन्म' दिया है
और यह आदमियत पुरूष और महिला के
अस्तित्व से कहीं अलग है
इसमें पुरूष होने का 'दम्भ' तो है,
लेकिन वह मजबूत होने की बजाय जर्जर है
इस आदमियत का मसीहा
'मसीही-विहीन' है
वह ईश्वर तो है,
लेकिन उसके साथ ईश्वरी नहीं है
वह प्रभू है,
लेकिन उसके साथ कोई प्रभूई नहीं है
वह परमपिता है
लेकिन उसके साथ कोई परममाता नहीं है
वह अल्लाह भी है
लेकिन उसके साथ कोई अल्लाही नहीं है
यह भाषाई अकाल है या आदमी का दम्भ है
आदमी के इसी दम्भ ने उसे
प्रकृति से दूर किया है
प्रकृति जहां एक साम्य में रहती है
वहीं आदमियत एक कोरी
'परिकल्पना' बनकर रह जाती है
जो ताकतवर तो है
लेकिन ताकतवरी नहीं बन पाती।
फिर यह आदमियत
कहीं पर भी 'बालसुलभ' नहीं हो पाती
हम बालमन की बातें इससे नहीं कर पाते
भौतिक सुखों के लाभ और लोभ
से युक्त यह आदमियत
इंसान और इंसानी का फर्क नहीं बता पाती
फर्क क्या, वह अपने दम्भ के कारण
इंसानी को जन्म ही नहीं दे पाती
हम जब भी आदमियत की
इस जन्म न दे पाने की कमजोरी पर
अंगुली उठाते हैं
तो अंगुली की रक्षार्थ कोई 'अंगुला' भी नहीं पाते हैं
इस तरह से हम देखते हैं कि
कुदरत के इस 'कुदरती' आदमी ने
ईश्वर, प्रभू, परमपिता और अल्लाह तो बना दिए,
पर कोई ईश्वरी, प्रभूई, परममाता और अल्लाही
न बनाकर
भाषाई अकाल के इस दम्भ और दौर में
हमेशा के लिए उसे अकेला छोड़ दिया।
सरदार
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