धीरे-धीरे ढ़हने लगती हैं
वह ईमारतें
जिनमें कोई नहीं रहता
कहीं प्लसतर गिरता है
कहीं छत उधड़ती है
कहीं मुखडोली गिरती है
तो कहीं से पानी रिसता है।
दरार जब दीवारों में पड़ती है
उग आते हैं
पंछियों के छोड़े गए बीज उनमें
और लेने लगते हैं गिरफ्त में
अपनी जड़ों के
उस जर्जर ईमारत को।
ऐसी ही मजबूत-सी दिखने वाली
मगर कमजोर ईमारत की जद में
गिरफ्तार है मेरा समुदाय
और बंद पाता है
खुद को
जहां न कोई खिड़की है
न बाहर को जाने का दरवाजा।
कुछ लोग रंग रहे हैं अपने खून से इसे
और कुछ
लगे हैं दीवारों को दरकाने में
थोड़ा सा सरकाने में
कोशिश कर रहे हैं
कहीं से तो सरकेगी
थोड़ा सा तो दरकेगी
ताकि
उगाया जा सके
रोपा जा सके
एक आदिवासियत का पौधा
जो जिंदा कर सके इस समुदाय को।
मेरा आह्वान है कि
जोर तो लगाओ
यह गिरेगी
भरभराकर गिरेगी
बनो पौध
बढ़ाओ अपनी जड़ें
धंस जाओ एक-एक ईंट में
हिला दो नींव को
उतार दो इसका यह प्लस्तर
उदेड़ दो इसकी छतें
और बढ़ने दो आदिवासियत का यह पौधा
जिसे कुम्हला दिया है
पीढ़ियों की खामोशी ने...
सरदार
18.09.2022
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