मैनें खिड़की से मां को निहारा
चाय लेकर आती पत्नी को देखा
आंगन को बुहारती छोटी बहू को देखा
चूल्हे के आगे बैठकर आग से तपती जीजी को देखा
और बगल की मेज पर रखे मोबाइल से बेटी को देखने के लिए
वीडियो कॉल कर दिया
सब एक-दूसरे की जिंदगी में
खुशियां भरते
घर-आंगन में खुशियां बिखेरते
अपने-अपने काम में मशगूल हैं
बेटी ने फोन की स्क्रीन पर
चिड़िया की तरह चहकते हुए
ढूंढा़डी बोली को मराठी के लहजे में पूछा
बड़े पापा निका हो न
मैं जवाब में मुस्कुरा कर कुछ बोलता
उससे पहले ही
चाय का कप रखकर विजय चहक उठी
और पूछा बेटी से
गुन्नू, जीजी के घर कब आवगी?
बिटिया बोलती तब तक
बगर भी जाग चुका था
और स्क्रीन पर चहक रही बहन को देखकर बोला
आजा
हम सब हंस दिए
जीजी भी चूल्हे के आगे से उठकर
फोन के पास आ गई
और बोली
बेटी, घरां कद आवगी?
मां ने मेरे हाथ से
फोन लेकर, बगर को गोद में उठाकर
छोटी बहू को दे दिया
और सब चूल्हे की आग के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गईं
मैं दूर खड़ा
सबके चहकने की आवाजें सुनता रहा
घर की खुशियां मुझे बेफिक्र कर रहीं थी
आधी आबादी का हंसना-मुस्कुराना
आते हुए बसंत का स्वागत करते
सरसों के पीले फूलों के सौंदर्य और महक को
घर के आंगन में
नीम के पत्तों से छनकर आते
उजाले के साथ उतार रहा था।
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