सभ्य समाज के सहयोग से
सरकारें कम्पनियों के लिए
लाल क़ालीन बिछाती हैं
बदले में कम्पनियाँ
सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।
हम आदिवासी
मुँह ताकते रहते हैं
इंतज़ार में रहते हैं
कि कम्पनियों को सरकार रोकेगी
पर नहीं समझ पाते कि
कम्पनियाँ, सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।
सरकारों के इशारे पर
सभ्य समाज के कुछ
सभ्य और भद्र जन
आदिवासियों को असभ्य कहते हैं
और दिन रात सभ्य बनाने की जुगत में लगे रहते हैं।
सभ्य बनाना चाहते हैं
क्यूँ कि कम्पनियों ने आदेश दिया है सरकारों को
ज़मीन ख़ाली कराने का,
जंगल ख़ाली कराने का
बिना सभ्य हुए कैसे आदिवासी
ज़मीन छोड़ेंगे
जंगल छोड़ेंगे
सरकारें फ़रमान निकालती हैं
ज़मीनें ख़ाली कराती हैं
कंपनियो को लाती हैं
सभ्यों को अपनी मेहनत का मेहनताना देती हैं
और आदिवासी!
आदिवासी भूल जाते हैं कि,
कम्पनियाँ, सरकारों के लिए सत्ता के गलियारे सजाती हैं।
२६ जनवरी, २०२२ बुद्धवार
Wah,Kya kehna
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