कहाँ आसान है इतना अपनी जड़ों से दूर हो जाना
कहीं पत्ते फड़फड़ाते हैं कहीं शाखें चरमाराती हैं
यह जो खामोशी सी चंद महीनों से लबों पर है
दिलों में उमड़ आने वाले सैलाब की निशानी है
वह जंगल से निकाले जाएंगें जंगली बताकर के
उन्हें शहरों में घुसने कौन देगा जंगली बताकर के
वह अपनी रूह अपना जिस्म लेकर चल दिये होते
अगर इन जंगलों में पुरखों की सांसों की महक नहीं होती
अभी तुम लोभ लाचल डर दिखाकर दरबदर कर दोगे उनको
तुम्हारे मुंह का निवाला खून से उनके भीगता होगा...
तुम्हें मालूम है 'सरदार' कि तुम्हारी जड़ कहाँ तक हैं
हवाओं कहाँ तक जड़ फैलाकर जिंदा रह पाओगे...
जोहार
24.7.2020
कहीं पत्ते फड़फड़ाते हैं कहीं शाखें चरमाराती हैं
यह जो खामोशी सी चंद महीनों से लबों पर है
दिलों में उमड़ आने वाले सैलाब की निशानी है
वह जंगल से निकाले जाएंगें जंगली बताकर के
उन्हें शहरों में घुसने कौन देगा जंगली बताकर के
वह अपनी रूह अपना जिस्म लेकर चल दिये होते
अगर इन जंगलों में पुरखों की सांसों की महक नहीं होती
अभी तुम लोभ लाचल डर दिखाकर दरबदर कर दोगे उनको
तुम्हारे मुंह का निवाला खून से उनके भीगता होगा...
तुम्हें मालूम है 'सरदार' कि तुम्हारी जड़ कहाँ तक हैं
हवाओं कहाँ तक जड़ फैलाकर जिंदा रह पाओगे...
जोहार
24.7.2020

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