Friday, July 24, 2020

कहाँ आसान है इतना अपनी जड़ों से दूर हो जाना
कहीं पत्ते फड़फड़ाते हैं कहीं शाखें चरमाराती हैं

यह जो खामोशी सी चंद महीनों से लबों पर है
दिलों में उमड़ आने वाले सैलाब की निशानी है

वह जंगल से निकाले जाएंगें जंगली बताकर के
उन्हें शहरों में घुसने कौन देगा जंगली बताकर के

वह अपनी रूह अपना जिस्म लेकर चल दिये होते
अगर इन जंगलों में पुरखों की सांसों की महक नहीं होती

अभी तुम लोभ लाचल डर दिखाकर दरबदर कर दोगे उनको
तुम्हारे मुंह का निवाला खून से उनके भीगता होगा...

तुम्हें मालूम है 'सरदार' कि तुम्हारी जड़ कहाँ तक हैं
हवाओं कहाँ तक जड़ फैलाकर जिंदा रह पाओगे...

जोहार
24.7.2020

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